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रविवार, 25 जुलाई 2010

गुरु पूर्णिमा की बहुत बहुत शुभकामनाएँ

 गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेवो महेश्वर:।'

गुरु साक्षात् परब्रह्म् तस्मै श्री गुरुवे नम:।।


गुरु पूर्णिमा का यह पर्व आषाढ मास की पूर्णमासी को मनाया जाता है।यह पर्व गुरु को अर्पित पर्व है। इस दिन अपने गुरुजी अथवा कुलगुरु की पूजा करनी चाहिए । श्रीकृ्ष्ण जी ने भी गुरु भक्ति के विषय में श्रीमदभागवत के एकाद्श स्कंध के अठारहवें अध्याय के 29 वें श्लोक में कहा है --


"तावत परिचरेद भक्तः श्रद्धावान न सूचक: ।


यावत ब्रह्म विजानीयान्ममेव गुरुमादृ्तः ।।"


अर्थात प्रभु कहते है -कि गुरु के प्रति पूर्ण सम्मान .द्दढ भक्ति और पूर्ण श्रृद्धा रखते हुए ब्रह्म प्राप्ति का पूर्ण मार्ग दर्शन प्राप्त होने तक गुरु के प्रति जरा भी शंका न करे ।न ही उन के किसी दोष के प्रति ध्यान दे।ब्रह्म प्राप्ति होने तक मुझे ही गुरु के रुप में देखे ।


गुरु रुहानी सृष्टि के बाद्शाह होते है। वह हम पर जो उपकार करते है । उस उपकार का मूल्य हम कभी नही चुका सकते है। वह ही हमारे सच्चे मित्र होते है।हमारी रक्षा हर मुश्किल में तथा लोक परलोक में भी संग होते है । अगर हम सदगुरु को परमात्म-स्वरुप समझकर प्रेम और श्रृद्धा से उनकी उपासना करते है तो शीघ्र ही जीवन की परम मंजिल को प्राप्त कर लेते है।वास्तव में पूर्ण सदगुरु मसीहा हैं जो धरा पर जन-कल्याण हेतु आते हैं ।परमात्मा से भी बडा सतगुरु का स्थान है तभी तो कबीर दास जी ने कहा है--कि


"गुरु गोंविन्द दोऊ खडे काके लागूँ पाँय ।


बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय ।"


अंत में श्री सदगुरु जी के श्री चरणों में कोटि- कोटि प्रणाम कर इतना ही कहूंगी कि सतगुरु ही दाता है, सच्चे नाम के इस जग में, तीनों लोको में नहीं ,सतगुरु सम कोई मीत ।


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार

सोमवार, 19 जुलाई 2010

अशुभ क्रकच योग

अशुभ क्रकच योग


 20 जुलाई 2010 मंगलवार ,दशमी तिथि को यह अशुभ क्रकच योग उत्पन्न हो रहा है । तिथि और वार के अंको का योग यदि 13 हो तो क्रकच नामक योग होता है । ऎसा योग मंगल कार्यो के लिए अमंगलकारी माना जाता है इसलिए ऎसे योग में शुभ कार्यो को नही करना चाहिए । ऎसे योग का  का वर्णन इस प्रकार से है :-

 वार रवि          सोम       मंगल      बुध         गुरु       शुक्र       शनि
अंक    1               2           3          4            5             6               7
तिथि द्धादशी    एकादशी   दशमी   नवमी      अष्टमी    सप्तमी      षष्ठी


 जैसे ---मंगलवार का अंक 3 और दशमी तिथि का 10 जो 10 +3=13 होता है ।

चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार


मंगलवार, 13 जुलाई 2010

रथ यात्रा

आज भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का पर्व है । भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा आषाढ शुक्ल पक्ष की दूज को मनाई जाती है।रथ यात्रा के इस पवन दिन श्री बलराम जी ,श्री कृष्णजी और देवी सुभद्रा जी का पूजन किया जाता है। श्री बलराम जी ,श्री कृष्णजी और देवी सुभद्रा जी की प्रतिमाएं को सुन्दर वस्त्रो,हार श्रृंगार और पुष्प मालाओ से सुसजित कर झांकी यात्रा निकाली जाती है।




हर साल रथो का निर्माण होता है । श्री जगन्नाथ जी का रथ जिसे नंदीघोष रथ कहा जाता है ।उन्हे लाल -पीले रंगो के कपडे से सजाया जाता है ।इस रथ में 16 पहिए लगे होते है । श्री बलभद्र जी का रथ जिसे तालध्वज रथ कहा जाता है इसे भी लाल-हरे रंगो के कपडे से सजाया जाता है।इस रथ की एक पहचान यह भी है कि इस रथ पर खजूर की पत्तियों का झंडा होता है।इस रथ में 14 पहिये होते है। दर्पदलम रथ जो देवी सुभद्रा जी का होता है।यह काले लाल कपडे से सजा होता है।जो शक्ति का प्रतीक होता है ।इस रथ में 12 पहिये लगे होते है । सोने के मूठ वाले चामर से सभी रथो पर बारी बारी चामर झला जाता है। भगवान जगन्नाथ इस दिन अपने बडे भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अलग अलग रथो मे बैठकर अपने जन्मस्थान गुण्डिचा मंदिर की ओर यात्रा करते है। इस दिन लोग व्रत भी रखते है ।ऎसा कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने वालो पर भगवान शेषनाग रक्षा करते है और उन्हे सब सुख-ऎश्वर्य प्रदान कर उन के सभी पापो का नाश करते है ।




भगवान जगन्नाथ जी का ये मंदिर 400 साल पुराना है । इस मंदिर के विषय मे यह कहा जाता है कि जिस शिल्पकार ने इन मूर्तियों का निर्माण किया था वह इन मूर्तियो के पैर तथा हाथ की कलाई नही बना पाया था और तभी आकाश वाणी हुई कि इन मूर्तियों को ऎसे ही स्थापित कर दिया जाएँ ।तब से ये मूर्तियाँ ऎसी ही स्थापित कर दी गई |


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार

सोमवार, 12 जुलाई 2010

नवरात्रे

सोमवार 12 जुलाई 2010 आषाढ शुक्लपक्ष प्रतिपदा तिथि, को माता का पहला नवरात्रा है। वैसे तो साल मे दो बार ही नवरात्र बनाया जाता है।एक चैत्र शुक्ल पक्ष के महीने मे और दूसरा आश्विन शुक्ल पक्ष के माह मे लेकिन दो बार ओर नवरात्रे आते है जिसे गुप्त नवरात्रा कहा जाता है ।वह गुप्त नवरात्रा एक तो आषाढ शुक्ल पक्ष मास मे और दूसरा गुप्त नवरात्रा माघ शुक्ल पक्ष के मास मे आता है। ये गुप्त नवरात्रे साधना सिद्धि के लिए होते है।तांत्रिक सिद्धि के लिए ये गुप्त नवरात्रे बहुत उपयुक्त होते है। गृहस्थ व्यक्ति को भी   इन दिनो मे माँ की पूजा आराधना कर और कुण्डलिनी शक्ति जागाकर क्रियाशील करनी चाहिए । ब्रह्मा,विष्णु,रुद्र,ईश्वर,सदाशिव और परशिव ये शिव कहलाते है । डाकिनी, राकिनी, लाकिनी, काकिनी, शाकिनी और हाकिनी ये छह शक्तियाँ है जो क्रमशःषटचक्र के अधिष्टातृ देवी-देवता है।साधना कर साधक शिव-शक्ति रुप मे परमात्मा का दर्शन पाते है। इन दिनो मे साधको के साधन का फल व्यर्थ नही जाता है ।माँ अपने भक्तो को उनकी साधना के अनुसार फल देती है। इन दिनो मे दान पुण्य का भी बहुत महत्व होता है।


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार



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