मंगलवार, 14 फरवरी 2012
वेलेंटाइन डे
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ज्योतिष
बुधवार, 9 नवम्बर 2011
पंचक
आज की पोस्ट पंचक के ऊपर है।पंचक अर्थात पाँच नक्षत्र-धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और
रेवती। इसमें जन्म और मृ्त्यु दोनो को अशुभ माना जाता है। अतः पंचक की शान्ति अवश्य करानी चाहिये।धनिष्ठा ,उत्तराभाद्रपद, शतभिषा, यें तीन नक्षत्र तमोगुणी नक्षत्र कहलाते है।पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र सतोगुणी तथा रेवती रजोगुणी नक्षत्र में आता है। धनिष्ठा नक्षत्र के देवता वसु तथा स्वामी मंगल है।शतभिषा नक्षत्र के देवता वरुण तथा स्वामी राहू है।पूर्वाभाद्रपाद जिसके देवता अहि तथा स्वामी गुरु है।उत्तराभाद्रपाद नक्षत्र के देवता नाग तथा स्वामी शनि है।रेवती नक्षत्र के देवता पितर तथा बुध है।पंचक में पाँच कर्म नही करने चाहिए।--
- तृ्ण और काष्ठ संग्रह करना ।
- मकान की छत डालना ।
- दक्षिण दिशा की यात्रा ।
- खटिया अथवा पंलग बनाना या बुनना ।
- प्रेतदाह
इन सभी में प्रथम चार कार्य को तो रोका जा सकता है लेकिन प्रेतदाह अर्थात शव का दाह-संस्कार इसको टाला नही जा सकता है इसलिए अगर पंचक में किसी की मृ्त्यु हो जाएँ तो उसके परिहार के लिए शव के साथ पाँच पुतले बनाकर जलाये जाते है।जिससे इस अशुभ स्थिति को टाला जा सके ।कुशा के पाँच पुतले बना कर उनपर मौली लपेटकर उसे शव के साथ अर्थी पर रखकर तिल,शहद से पूजन कर पहला पुतला शव के सिर पर,दूसरा नेत्रो पर ,तीसरा दाई कूख पर,चौथा नाभी पर ,पाँचवा पैरो पर रखा जाता है।फिर इन नक्षत्र देवताओ की मंत्र द्धारा आहुति दी जाती है।
पंचक मे मृ्त्यु को अशुभ माना जाता है उसका तो परिहार कर दिया जाता है लेकिन पंचक मे जिस बालक का जन्म हो उसकी शान्ति भी जरुर करवानी चाहिए । जिस तरह गंड्मूल की पूजा में 27 वस्तुओ की जरुरत होती है ।उसी तरह पंचक शान्ति में सात वस्तुओ का महत्व होता है। सूतकोपरांत सात वृ्क्षों के पत्ते, सात धान्य, सात तिलहन से सब गर्म पानी में उबालकर उस पानी से बालक को स्नान करवाये । उबालने के लिए नया मिट्टी का बर्तन लें । घडे में सात छिद्र करे तथा छलनी में घास डालकर घडे के नीचे रखकर स्नान कराये ।यदि जन्म दिन का है तो पिता पानी डाले, अगर रात का जन्म है तो माता पानी डाले ।यदि सध्याकाल का जन्म है तो दोनो पानी डाले।
कहा जाता है कि धनिष्ठा नक्षत्र में छत को डालना,दक्षिण दिशा की यात्रा,और चारपाई बनाना निषेध माना गया है क्योकि इसमे अग्नि भय होता है।शतभिषा नक्षत्र में कलह,पूर्वाभाद्रपाद में करने से रोग, उत्तराभाद्रपाद में करने से जुर्माना, रेवती नक्षत्र मे करने से धन की हानि होती है।
चित्र गुगल साभार
कहा जाता है कि धनिष्ठा नक्षत्र में छत को डालना,दक्षिण दिशा की यात्रा,और चारपाई बनाना निषेध माना गया है क्योकि इसमे अग्नि भय होता है।शतभिषा नक्षत्र में कलह,पूर्वाभाद्रपाद में करने से रोग, उत्तराभाद्रपाद में करने से जुर्माना, रेवती नक्षत्र मे करने से धन की हानि होती है।
चित्र गुगल साभार
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ज्योतिष
मंगलवार, 28 सितम्बर 2010
पितृपक्ष अर्थात श्राद्ध पक्ष
पितृपक्ष अर्थात श्राद्धपक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक रहते है।इसमें पितरों का तर्पण किया जाता है।श्राद्ध के द्वारा पितृ- ऋण से निवृति प्राप्त होती है।दिवंगत पूर्वजों की तिथि पर उनके निमित ब्राह्मणों को भोजन करा देने से हमारे पितृ खुश हो जाते है।पुरुष की तिथि पर ब्राह्मण को और स्त्री की तिथि पर ब्राह्मणी को भोजन कराया जाता है।भोजन कराने के बाद यथा शक्ति दान-दक्षिणा,वस्त्र देना चाहिए। दिवंगत पूर्वजों की प्रसन्नता ही पितृ ऋण से मुक्त करा देती है।इसे पार्वण श्राद्ध कहते है। पार्वण श्राद्ध के लिए अपराह्ण व्यापिनी तिथि ली जाती है। जिसकी मृत्यु की तिथि का पता न हो उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।श्राद्ध भोजन का समय दोपहर का होता है। जिसे कुतुप बेला कहते है।अमावस्या के दिन हमारे पितृगण वायु रुप में हमारे घर के दरवाजे पर उपस्थित रहते है और अपने स्वजनो से श्राद्ध की अभिलाषा करते है।जब तक सुर्य अस्त नही हो जाता तब तक वे वही भूख-प्यास से व्याकुल होकर खडे रहते है। जो श्राद्ध करते है वे उन्हे आयु ,पुत्र ,यश , कीर्ति , सुख ,धन और धान्य आदि का आर्शीवाद दे अपने लोक को चले जाते है।देवताओ से पहले पितरो को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी होता है।देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व होता है। वायु पुराण ,मत्स्य पुराण ,गरुण पुराण, विष्णु पुराण आदि पुराणों तथा अन्य शास्त्रों जैसे मनुस्मृति इत्यादि में भी श्राद्ध कर्म के महत्व के बारे में बताया गया है।श्राद्ध मे तिल बहुत पवित्र माने जाते है। तिल का प्रयोग करने पर असुर ,दानव और दैत्य भाग जाते है। एक ही तिल का दान स्वर्ण के बत्तीस सेर तिल के समान है।तिल तथा कुश की उत्पत्ति विष्णु जी के शरीर से हुई थी ।तिल विष्णु जी के पसीने से उत्पन्न हुए है तथा कुश की उत्पत्ति विष्णु जी के रोमों से हुई है इसलिए पितृकार्य में इसका विशेष महत्व होता है। कुश के मूल भाग में ब्रह्मा ,मध्य भाग में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास माना जाता है।श्राद्ध प्रेतजनों को जिस प्रकार से तृप्ति प्रदान करता है उस के लिए भगवान विष्णुजी ने कहा है कि "मनुष्य अपने कर्मानुसार यदि देवता हो जाता है तो श्राद्धान्न अमृत होकर उसे प्राप्त होता है और् वही अन्न गन्धर्व योनि में भोग रुप से तथा पशु योनि में तृणरुप में,नाग योनि में वायुरुप से,पक्षी योनि में जलरुप से और राक्षस योनि मे आमिष तथा दानव योनि के लिए मांस, प्रेत के लिए रक्त,मनुष्य के लिये अन्न-पानादि और बाल्यावस्था में भोग रस हो जाता है।
चित्र साभार - गूगल
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धर्म
बृहस्पतिवार, 5 अगस्त 2010
ज्योतिष
ज्योतिष वेदांग के छः भागों का एक अंग है । पहले महाऋर्षिगण नि:स्वार्थ रुप से लोगों की भलाई के लिए इस विद्या का उपयोग करते थे लेकिन आज ये केवल व्यवसाय का रुप बनती जा रही है ।मैं भी ज्योतिष की विद्यार्थी हूँ क्योकि यह विद्या अथाह सागर का भंडार है।मेरे अपने तर्क से कोई भी इस में परिपूर्ण नहीं है। जितनी बार इसे हम पढ्ते है नया से नया ज्ञान प्राप्त होता है। आज इस पर शोध करने की आवश्कता है ताकि लोगों मे पल रहे इस के प्रति अज्ञान व अंधविश्वास को दूर किया जा सके ।पहले के महाऋर्षियों के पास दिव्यदृ्ष्टि होती थी जो अपनी सूक्ष्म दृ्र्ष्टि द्धारा भूत, भविष्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया करते थे ।जातक की कुंडली को देखकर उस के भविष्य में घटित होने वाली शुभ अशुभ घटनाओं को देखा जा सकता है, न कि इसे टाला जा सके ।ज्योतिष के माघ्यम से हम उस के भविष्य की बुरी घट्ना को टालने की विधियां जरुर बता सकते है लेकिन उसे सम्पूर्ण रुप से नष्ट नहीं कर सकते है।प्रारब्ध कर्म तो उसे भोगना ही पड्ता है। हमारा जीवन जब दुखी होता है तो उसे सुखी बनाने के लिए ज्योतिषी के पास जाते है लेकिन ज्योतिषी कोई भगवान नहीं है ! ऎसा ही एक किस्सा सुनाती हूँ । एक महिला मेरे पास किसी की शादी के सिलासले मे आई । कहने लगी कि बहुत पंडितो को देखा दिया है सभी कहते है कि शादी का योग तो चल रहा है लेकिन फिर भी पता नही क्यों इसकी शादी नही हो रही है आप ऎसा कुछ उपाय बताएँ कि थोडे ही दिनों में इस की शादी हो जाएँ । मैने उस की कुंडली को देखा और कहा कि कल बताऊंगी क्योंकि मैं इतनी जल्दी इस का उत्तर नही देना चाहती थी । आखिर इतने पंडितों से पूछ कर जो मेरे पास आई थी! तो उस कुडंली का गंभीर विश्लेषण मेरे लिए जरुरी था । कल फिर वह महिला आई मैने उसे कहा कि अभी इसका विवाह का योग नही है । तीन साल के बाद विवाह होगा । अब वह कहने लगी कि कोई पूजा,दान,से बात नही बन सकती । अब हार कर मैने कुछ उपाय बता दिएं और कहा कि इन उपायों को वह कर लेती है तो उसके बाद जब लड्का देखने जाएं तो मुझे जरुर बता देना उस समय जो बताऊंगी फिर वह कर लेना ।प्रकृति के आगे इंसान का कोई बस नहीं चलता यही हुआ वह लडकी उन उपायो को नही कर पाई ।तीन चार महीने बाद उन उपायो को वह कर पाई । अब क्या था दो महीने के बाद उस ने बताया कि दो दिन बाद हम लडका देखने जा रहे क्या बात बन जाएंगी ? मैने कहा ठीक है जब लडका देख लोगे अगर पंसन्द आये तो मुझे फोन कर देना मै एक उपाय उसी समय करने को कहूंगी वह कर लिया तो रिश्ता पक्का समझना । अचानक मुझे पता चला कि गुरु जी ने दो दिन साधना की शिक्षा देनी है । मै चली गई । अब कक्षा में मोबाइल बंद रखना पडता है तो उसका मुझसे संपर्क न हो पाया । बाद मे पता चला कि उस ने हमे काफ़ी फोन किया था और उस ने बताया कि लड्का अच्छा था हमे पंसन्द था उन की तरफ से हां ही लग रही थी पर न जाने क्या हुआ कि उन का बाद मे फोन आया कि हमे ये रिश्ता नही करना ।वास्तव मे प्रकृति के आगे किसी का बस नही है । संचित और प्रारब्ध कर्मो का फल जातक को अपने इस जीवन में भोगना ही पड्ता है । थोडे बहुत उपायों द्धारा उसे हम कम कर सकते है लेकिन मिटाना किसी भी ज्योतिषी के हाथ में नही इसलिए मैंने पहले जो कहा कि इस पर शोध की आवश्यकता है उस के लिए निःस्वार्थ आगे आने की जरुरत है । वैसे तो संगीता जी, पंडित शर्मा जी का प्रयास भी प्रशंसनीय है । लेकिन औरो को भी आगे आना चाहिए ताकि इस शास्त्र की उन्नति हो सके और जो अपने स्वार्थ वश इस विद्या को कंलकित कर रहे है,उन से इसे बचाया जा सके। इस शास्त्र के गौरव की रक्षा के लिए अनुसन्धान कार्य में सरकार को भी मदद करनी चाहिए ।
चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
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ज्योतिष
रविवार, 25 जुलाई 2010
गुरु पूर्णिमा की बहुत बहुत शुभकामनाएँ
गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेवो महेश्वर:।'
गुरु साक्षात् परब्रह्म् तस्मै श्री गुरुवे नम:।।
गुरु पूर्णिमा का यह पर्व आषाढ मास की पूर्णमासी को मनाया जाता है।यह पर्व गुरु को अर्पित पर्व है। इस दिन अपने गुरुजी अथवा कुलगुरु की पूजा करनी चाहिए । श्रीकृ्ष्ण जी ने भी गुरु भक्ति के विषय में श्रीमदभागवत के एकाद्श स्कंध के अठारहवें अध्याय के 29 वें श्लोक में कहा है --
"तावत परिचरेद भक्तः श्रद्धावान न सूचक: ।
यावत ब्रह्म विजानीयान्ममेव गुरुमादृ्तः ।।"
अर्थात प्रभु कहते है -कि गुरु के प्रति पूर्ण सम्मान .द्दढ भक्ति और पूर्ण श्रृद्धा रखते हुए ब्रह्म प्राप्ति का पूर्ण मार्ग दर्शन प्राप्त होने तक गुरु के प्रति जरा भी शंका न करे ।न ही उन के किसी दोष के प्रति ध्यान दे।ब्रह्म प्राप्ति होने तक मुझे ही गुरु के रुप में देखे ।
गुरु रुहानी सृष्टि के बाद्शाह होते है। वह हम पर जो उपकार करते है । उस उपकार का मूल्य हम कभी नही चुका सकते है। वह ही हमारे सच्चे मित्र होते है।हमारी रक्षा हर मुश्किल में तथा लोक परलोक में भी संग होते है । अगर हम सदगुरु को परमात्म-स्वरुप समझकर प्रेम और श्रृद्धा से उनकी उपासना करते है तो शीघ्र ही जीवन की परम मंजिल को प्राप्त कर लेते है।वास्तव में पूर्ण सदगुरु मसीहा हैं जो धरा पर जन-कल्याण हेतु आते हैं ।परमात्मा से भी बडा सतगुरु का स्थान है तभी तो कबीर दास जी ने कहा है--कि
"गुरु गोंविन्द दोऊ खडे काके लागूँ पाँय ।
बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय ।"
अंत में श्री सदगुरु जी के श्री चरणों में कोटि- कोटि प्रणाम कर इतना ही कहूंगी कि सतगुरु ही दाता है, सच्चे नाम के इस जग में, तीनों लोको में नहीं ,सतगुरु सम कोई मीत ।
चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
गुरु साक्षात् परब्रह्म् तस्मै श्री गुरुवे नम:।।
गुरु पूर्णिमा का यह पर्व आषाढ मास की पूर्णमासी को मनाया जाता है।यह पर्व गुरु को अर्पित पर्व है। इस दिन अपने गुरुजी अथवा कुलगुरु की पूजा करनी चाहिए । श्रीकृ्ष्ण जी ने भी गुरु भक्ति के विषय में श्रीमदभागवत के एकाद्श स्कंध के अठारहवें अध्याय के 29 वें श्लोक में कहा है --
"तावत परिचरेद भक्तः श्रद्धावान न सूचक: ।
यावत ब्रह्म विजानीयान्ममेव गुरुमादृ्तः ।।"
अर्थात प्रभु कहते है -कि गुरु के प्रति पूर्ण सम्मान .द्दढ भक्ति और पूर्ण श्रृद्धा रखते हुए ब्रह्म प्राप्ति का पूर्ण मार्ग दर्शन प्राप्त होने तक गुरु के प्रति जरा भी शंका न करे ।न ही उन के किसी दोष के प्रति ध्यान दे।ब्रह्म प्राप्ति होने तक मुझे ही गुरु के रुप में देखे ।
गुरु रुहानी सृष्टि के बाद्शाह होते है। वह हम पर जो उपकार करते है । उस उपकार का मूल्य हम कभी नही चुका सकते है। वह ही हमारे सच्चे मित्र होते है।हमारी रक्षा हर मुश्किल में तथा लोक परलोक में भी संग होते है । अगर हम सदगुरु को परमात्म-स्वरुप समझकर प्रेम और श्रृद्धा से उनकी उपासना करते है तो शीघ्र ही जीवन की परम मंजिल को प्राप्त कर लेते है।वास्तव में पूर्ण सदगुरु मसीहा हैं जो धरा पर जन-कल्याण हेतु आते हैं ।परमात्मा से भी बडा सतगुरु का स्थान है तभी तो कबीर दास जी ने कहा है--कि
"गुरु गोंविन्द दोऊ खडे काके लागूँ पाँय ।
बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय ।"
अंत में श्री सदगुरु जी के श्री चरणों में कोटि- कोटि प्रणाम कर इतना ही कहूंगी कि सतगुरु ही दाता है, सच्चे नाम के इस जग में, तीनों लोको में नहीं ,सतगुरु सम कोई मीत ।
चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
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सोमवार, 19 जुलाई 2010
अशुभ क्रकच योग
अशुभ क्रकच योग
वार रवि सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
अंक 1 2 3 4 5 6 7
तिथि द्धादशी एकादशी दशमी नवमी अष्टमी सप्तमी षष्ठी
20 जुलाई 2010 मंगलवार ,दशमी तिथि को यह अशुभ क्रकच योग उत्पन्न हो रहा है । तिथि और वार के अंको का योग यदि 13 हो तो क्रकच नामक योग होता है । ऎसा योग मंगल कार्यो के लिए अमंगलकारी माना जाता है इसलिए ऎसे योग में शुभ कार्यो को नही करना चाहिए । ऎसे योग का का वर्णन इस प्रकार से है :-
वार रवि सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
अंक 1 2 3 4 5 6 7
तिथि द्धादशी एकादशी दशमी नवमी अष्टमी सप्तमी षष्ठी
जैसे ---मंगलवार का अंक 3 और दशमी तिथि का 10 जो 10 +3=13 होता है ।
चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
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ज्योतिष
मंगलवार, 13 जुलाई 2010
रथ यात्रा
आज भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का पर्व है । भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा आषाढ शुक्ल पक्ष की दूज को मनाई जाती है।रथ यात्रा के इस पवन दिन श्री बलराम जी ,श्री कृष्णजी और देवी सुभद्रा जी का पूजन किया जाता है। श्री बलराम जी ,श्री कृष्णजी और देवी सुभद्रा जी की प्रतिमाएं को सुन्दर वस्त्रो,हार श्रृंगार और पुष्प मालाओ से सुसजित कर झांकी यात्रा निकाली जाती है।
हर साल रथो का निर्माण होता है । श्री जगन्नाथ जी का रथ जिसे नंदीघोष रथ कहा जाता है ।उन्हे लाल -पीले रंगो के कपडे से सजाया जाता है ।इस रथ में 16 पहिए लगे होते है । श्री बलभद्र जी का रथ जिसे तालध्वज रथ कहा जाता है इसे भी लाल-हरे रंगो के कपडे से सजाया जाता है।इस रथ की एक पहचान यह भी है कि इस रथ पर खजूर की पत्तियों का झंडा होता है।इस रथ में 14 पहिये होते है। दर्पदलम रथ जो देवी सुभद्रा जी का होता है।यह काले लाल कपडे से सजा होता है।जो शक्ति का प्रतीक होता है ।इस रथ में 12 पहिये लगे होते है । सोने के मूठ वाले चामर से सभी रथो पर बारी बारी चामर झला जाता है। भगवान जगन्नाथ इस दिन अपने बडे भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अलग अलग रथो मे बैठकर अपने जन्मस्थान गुण्डिचा मंदिर की ओर यात्रा करते है। इस दिन लोग व्रत भी रखते है ।ऎसा कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने वालो पर भगवान शेषनाग रक्षा करते है और उन्हे सब सुख-ऎश्वर्य प्रदान कर उन के सभी पापो का नाश करते है ।
भगवान जगन्नाथ जी का ये मंदिर 400 साल पुराना है । इस मंदिर के विषय मे यह कहा जाता है कि जिस शिल्पकार ने इन मूर्तियों का निर्माण किया था वह इन मूर्तियो के पैर तथा हाथ की कलाई नही बना पाया था और तभी आकाश वाणी हुई कि इन मूर्तियों को ऎसे ही स्थापित कर दिया जाएँ ।तब से ये मूर्तियाँ ऎसी ही स्थापित कर दी गई |
चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
हर साल रथो का निर्माण होता है । श्री जगन्नाथ जी का रथ जिसे नंदीघोष रथ कहा जाता है ।उन्हे लाल -पीले रंगो के कपडे से सजाया जाता है ।इस रथ में 16 पहिए लगे होते है । श्री बलभद्र जी का रथ जिसे तालध्वज रथ कहा जाता है इसे भी लाल-हरे रंगो के कपडे से सजाया जाता है।इस रथ की एक पहचान यह भी है कि इस रथ पर खजूर की पत्तियों का झंडा होता है।इस रथ में 14 पहिये होते है। दर्पदलम रथ जो देवी सुभद्रा जी का होता है।यह काले लाल कपडे से सजा होता है।जो शक्ति का प्रतीक होता है ।इस रथ में 12 पहिये लगे होते है । सोने के मूठ वाले चामर से सभी रथो पर बारी बारी चामर झला जाता है। भगवान जगन्नाथ इस दिन अपने बडे भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अलग अलग रथो मे बैठकर अपने जन्मस्थान गुण्डिचा मंदिर की ओर यात्रा करते है। इस दिन लोग व्रत भी रखते है ।ऎसा कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने वालो पर भगवान शेषनाग रक्षा करते है और उन्हे सब सुख-ऎश्वर्य प्रदान कर उन के सभी पापो का नाश करते है ।
भगवान जगन्नाथ जी का ये मंदिर 400 साल पुराना है । इस मंदिर के विषय मे यह कहा जाता है कि जिस शिल्पकार ने इन मूर्तियों का निर्माण किया था वह इन मूर्तियो के पैर तथा हाथ की कलाई नही बना पाया था और तभी आकाश वाणी हुई कि इन मूर्तियों को ऎसे ही स्थापित कर दिया जाएँ ।तब से ये मूर्तियाँ ऎसी ही स्थापित कर दी गई |
चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
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