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शनिवार, 22 जुलाई 2017

पंचमुखी हनुमान



पंचमुखी क्यों हुए हनुमान 
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लंका में महा बलशाली मेघनाद के साथ बड़ा ही भीषण युद्ध चला. अंतत: मेघनाद मारा गया. रावण जो अब तक मद में चूर था राम सेना, खास तौर पर लक्ष्मण का पराक्रम सुनकर थोड़ा तनाव में आया
रावण को कुछ दुःखी देखकर रावण की मां कैकसी ने उसके पाताल में बसे दो भाइयों अहिरावण और महिरावण की याद दिलाई.
लंका का राजा बनने के बाद उनकी सुध ही नहीं रही थी. रावण यह भली प्रकार जानता था कि अहिरावण व महिरावण तंत्र-मंत्र के महा पंडित, जादू टोने के धनी और मां कामाक्षी के परम भक्त हैं.
रावण ने उन्हें बुला भेजा और कहा कि वह अपने छल बल, कौशल से श्री राम व लक्ष्मण का सफाया कर दे. यह बात दूतों के जरिए विभीषण को पता लग गयी. युद्ध में अहिरावण व महिरावण जैसे परम मायावी के शामिल होने से विभीषण चिंता में पड़ गए.
विभीषण को लगा कि भगवान श्री राम और लक्ष्मण की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी करनी पड़ेगी. इसके लिए उन्हें सबसे बेहतर लगा कि इसका जिम्मा परम वीर हनुमान जी को राम-लक्ष्मण को सौंप दिया जाए. साथ ही वे अपने भी निगरानी में लगे थे.
राम-लक्ष्मण की कुटिया लंका में सुवेल पर्वत पर बनी थी. हनुमान जी ने भगवान श्री राम की कुटिया के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा खींच दिया. कोई जादू टोना तंत्र-मंत्र का असर या मायावी राक्षस इसके भीतर नहीं घुस सकता था.
अहिरावण और महिरावण श्री राम और लक्ष्मण को मारने उनकी कुटिया तक पहुंचे पर इस सुरक्षा घेरे के आगे उनकी एक न चली, असफल रहे. ऐसे में उन्होंने एक चाल चली. महिरावण विभीषण का रूप धर के कुटिया में घुस गया.
राम व लक्ष्मण पत्थर की सपाट शिलाओं पर गहरी नींद सो रहे थे. दोनों राक्षसों ने बिना आहट के शिला समेत दोनो भाइयों को उठा लिया और अपने निवास पाताल की और लेकर चल दिए.
विभीषण लगातार सतर्क थे. उन्हें कुछ देर में ही पता चल गया कि कोई अनहोनी घट चुकी है. विभीषण को महिरावण पर शक था, उन्हें राम-लक्ष्मण की जान की चिंता सताने लगी.
विभीषण ने हनुमान जी को महिरावण के बारे में बताते हुए कहा कि वे उसका पीछा करें. लंका में अपने रूप में घूमना राम भक्त हनुमान के लिए ठीक न था सो उन्होंने पक्षी का रूप धारण कर लिया और पक्षी का रूप में ही निकुंभला नगर पहुंच गये.
निकुंभला नगरी में पक्षी रूप धरे हनुमान जी ने कबूतर और कबूतरी को आपस में बतियाते सुना. कबूतर, कबूतरी से कह रहा था कि अब रावण की जीत पक्की है. अहिरावण व महिरावण राम-लक्ष्मण को बलि चढा देंगे. बस सारा युद्ध समाप्त.
कबूतर की बातों से ही बजरंग बली को पता चला कि दोनों राक्षस राम लक्ष्मण को सोते में ही उठाकर कामाक्षी देवी को बलि चढाने पाताल लोक ले गये हैं. हनुमान जी वायु वेग से रसातल की और बढे और तुरंत वहां पहुंचे.
हनुमान जी को रसातल के प्रवेश द्वार पर एक अद्भुत पहरेदार मिला. इसका आधा शरीर वानर का और आधा मछली का था. उसने हनुमान जी को पाताल में प्रवेश से रोक दिया. 
द्वारपाल हनुमान जी से बोला कि मुझ को परास्त किए बिना तुम्हारा भीतर जाना असंभव है. दोनों में लड़ाई ठन गयी. हनुमान जी की आशा के विपरीत यह बड़ा ही बलशाली और कुशल योद्धा निकला.
दोनों ही बड़े बलशाली थे. दोनों में बहुत भयंकर युद्ध हुआ परंतु वह बजरंग बली के आगे न टिक सका. आखिर कार हनुमान जी ने उसे हरा तो दिया पर उस द्वारपाल की प्रशंसा करने से नहीं रह सके.
हनुमान जी ने उस वीर से पूछा कि हे वीर तुम अपना परिचय दो. तुम्हारा स्वरूप भी कुछ ऐसा है कि उससे कौतुहल हो रहा है. उस वीर ने उत्तर दिया- मैं हनुमान का पुत्र हूं और एक मछली से पैदा हुआ हूं. मेरा नाम है मकरध्वज.
हनुमान जी ने यह सुना तो आश्चर्य में पड़ गए. वह वीर की बात सुनने लगे. मकरध्वज ने कहा- लंका दहन के बाद हनुमान जी समुद्र में अपनी अग्नि शांत करने पहुंचे. उनके शरीर से पसीने के रूप में तेज गिरा.
उस समय मेरी मां ने आहार के लिए मुख खोला था. वह तेज मेरी माता ने अपने मुख में ले लिया और गर्भवती हो गई. उसी से मेरा जन्म हुआ है. हनुमान जी ने जब यह सुना तो मकरध्वज को बताया कि वह ही हनुमान हैं.
मकरध्वज ने हनुमान जी के चरण स्पर्श किए और हनुमान जी ने भी अपने बेटे को गले लगा लिया और वहां आने का पूरा कारण बताया. उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि अपने पिता के स्वामी की रक्षा में सहायता करो.
मकरध्वज ने हनुमान जी को बताया कि कुछ ही देर में राक्षस बलि के लिए आने वाले हैं. बेहतर होगा कि आप रूप बदल कर कामाक्षी कें मंदिर में जा कर बैठ जाएं. उनको सारी पूजा झरोखे से करने को कहें.
हनुमान जी ने पहले तो मधु मक्खी का वेश धरा और मां कामाक्षी के मंदिर में घुस गये. हनुमान जी ने मां कामाक्षी को नमस्कार कर सफलता की कामना की और फिर पूछा- हे मां क्या आप वास्तव में श्री राम जी और लक्ष्मण जी की बलि चाहती हैं ?
हनुमान जी के इस प्रश्न पर मां कामाक्षी ने उत्तर दिया कि नहीं. मैं तो दुष्ट अहिरावण व महिरावण की बलि चाहती हूं.यह दोनों मेरे भक्त तो हैं पर अधर्मी और अत्याचारी भी हैं. आप अपने प्रयत्न करो. सफल रहोगे.
मंदिर में पांच दीप जल रहे थे. अलग-अलग दिशाओं और स्थान पर... मां ने कहा यह दीप अहिरावण ने मेरी प्रसन्नता के लिए जलाये हैं जिस दिन ये एक साथ बुझा दिए जा सकेंगे, उसका अंत सुनिश्चित हो सकेगा.
इस बीच गाजे-बाजे का शोर सुनाई पड़ने लगा. अहिरावण, महिरावण बलि चढाने के लिए आ रहे थे. हनुमान जी ने अब मां कामाक्षी का रूप धरा. जब अहिरावण और महिरावण मंदिर में प्रवेश करने ही वाले थे कि हनुमान जी का महिला स्वर गूंजा.
हनुमान जी बोले- मैं कामाक्षी देवी हूं और आज मेरी पूजा झरोखे से करो. झरोखे से पूजा आरंभ हुई ढेर सारा चढावा मां कामाक्षी को झरोखे से चढाया जाने लगा. अंत में बंधक बलि के रूप में राम लक्ष्मण को भी उसी से डाला गया. दोनों बंधन में बेहोश थे.
हनुमान जी ने तुरंत उन्हें बंधन मुक्त किया. अब पाताल लोक से निकलने की बारी थी पर उससे पहले मां कामाक्षी के सामने अहिरावण महिरावण की बलि देकर उनकी इच्छा पूरी करना और दोनों राक्षसों को उनके किए की सज़ा देना शेष था.
अब हनुमान जी ने मकरध्वज को कहा कि वह अचेत अवस्था में लेटे हुए भगवान राम और लक्ष्मण का खास ख्याल रखे और उसके साथ मिलकर दोनों राक्षसों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.
पर यह युद्ध आसान न था. अहिरावण और महिरावण बडी मुश्किल से मरते तो फिर पाँच पाँच के रूप में जिदां हो जाते. इस विकट स्थिति में मकरध्वज ने बताया कि अहिरावण की एक पत्नी नागकन्या है.
अहिरावण उसे बलात हर लाया है. वह उसे पसंद नहीं करती पर मन मार के उसके साथ है, वह अहिरावण के राज जानती होगी. उससे उसकी मौत का उपाय पूछा जाये. आप उसके पास जाएं और सहायता मांगे.
मकरध्वज ने राक्षसों को युद्ध में उलझाये रखा और उधर हनुमान अहिरावण की पत्नी के पास पहुंचे. नागकन्या से उन्होंने कहा कि यदि तुम अहिरावण के मृत्यु का भेद बता दो तो हम उसे मारकर तुम्हें उसके चंगुल से मुक्ति दिला देंगे.
अहिरावण की पत्नी ने कहा- मेरा नाम चित्रसेना है. मैं भगवान विष्णु की भक्त हूं. मेरे रूप पर अहिरावण मर मिटा और मेरा अपहरण कर यहां कैद किये हुए है, पर मैं उसे नहीं चाहती. लेकिन मैं अहिरावण का भेद तभी बताउंगी जब मेरी इच्छा पूरी की जायेगी.
हनुमान जी ने अहिरावण की पत्नी नागकन्या चित्रसेना से पूछा कि आप अहिरावण की मृत्यु का रहस्य बताने के बदले में क्या चाहती हैं ? आप मुझसे अपनी शर्त बताएं, मैं उसे जरूर मानूंगा.
चित्रसेना ने कहा- दुर्भाग्य से अहिरावण जैसा असुर मुझे हर लाया. इससे मेरा जीवन खराब हो गया. मैं अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलना चाहती हूं. आप अगर मेरा विवाह श्री राम से कराने का वचन दें तो मैं अहिरावण के वध का रहस्य बताऊंगी.
हनुमान जी सोच में पड़ गए. भगवान श्री राम तो एक पत्नी निष्ठ हैं. अपनी धर्म पत्नी देवी सीता को मुक्त कराने के लिए असुरों से युद्ध कर रहे हैं. वह किसी और से विवाह की बात तो कभी न स्वीकारेंगे. मैं कैसे वचन दे सकता हूं ?
फिर सोचने लगे कि यदि समय पर उचित निर्णय न लिया तो स्वामी के प्राण ही संकट में हैं. असमंजस की स्थिति में बेचैन हनुमानजी ने ऐसी राह निकाली कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.
हनुमान जी बोले- तुम्हारी शर्त स्वीकार है पर हमारी भी एक शर्त है. यह विवाह तभी होगा जब तुम्हारे साथ भगवान राम जिस पलंग पर आसीन होंगे वह सही सलामत रहना चाहिए. यदि वह टूटा तो इसे अपशकुन मांगकर वचन से पीछे हट जाऊंगा.
जब महाकाय अहिरावण के बैठने से पलंग नहीं टूटता तो भला श्रीराम के बैठने से कैसे टूटेगा ! यह सोच कर चित्रसेना तैयार हो गयी. उसने अहिरावण समेत सभी राक्षसों के अंत का सारा भेद बता दिया.
चित्रसेना ने कहा- दोनों राक्षसों के बचपन की बात है. इन दोनों के कुछ शरारती राक्षस मित्रों ने कहीं से एक भ्रामरी को पकड़ लिया. मनोरंजन के लिए वे उसे भ्रामरी को बार-बार काटों से छेड रहे थे.
भ्रामरी साधारण भ्रामरी न थी. वह भी बहुत मायावी थी किंतु किसी कारण वश वह पकड़ में आ गई थी. भ्रामरी की पीड़ा सुनकर अहिरावण और महिरावण को दया आ गई और अपने मित्रों से लड़ कर उसे छुड़ा दिया.
मायावी भ्रामरी का पति भी अपनी पत्नी की पीड़ा सुनकर आया था. अपनी पत्नी की मुक्ति से प्रसन्न होकर उस भौंरे ने वचन दिया थ कि तुम्हारे उपकार का बदला हम सभी भ्रमर जाति मिलकर चुकाएंगे.
ये भौंरे अधिकतर उसके शयन कक्ष के पास रहते हैं. ये सब बड़ी भारी संख्या में हैं. दोनों राक्षसों को जब भी मारने का प्रयास हुआ है और ये मरने को हो जाते हैं तब भ्रमर उनके मुख में एक बूंद अमृत का डाल देते हैं.
उस अमृत के कारण ये दोनों राक्षस मरकर भी जिंदा हो जाते हैं. इनके कई-कई रूप उसी अमृत के कारण हैं. इन्हें जितनी बार फिर से जीवन दिया गया उनके उतने नए रूप बन गए हैं. इस लिए आपको पहले इन भंवरों को मारना होगा.
हनुमान जी रहस्य जानकर लौटे. मकरध्वज ने अहिरावण को युद्ध में उलझा रखा था. तो हनुमान जी ने भंवरों का खात्मा शुरू किया. वे आखिर हनुमान जी के सामने कहां तक टिकते.
जब सारे भ्रमर खत्म हो गए और केवल एक बचा तो वह हनुमान जी के चरणों में लोट गया. उसने हनुमान जी से प्राण रक्षा की याचना की. हनुमान जी पसीज गए. उन्होंने उसे क्षमा करते हुए एक काम सौंपा.
हनुमान जी बोले- मैं तुम्हें प्राण दान देता हूं पर इस शर्त पर कि तुम यहां से तुरंत चले जाओगे और अहिरावण की पत्नी के पलंग की पाटी में घुसकर जल्दी से जल्दी उसे पूरी तरह खोखला बना दोगे.
भंवरा तत्काल चित्रसेना के पलंग की पाटी में घुसने के लिए प्रस्थान कर गया. इधर अहिरावण और महिरावण को अपने चमत्कार के लुप्त होने से बहुत अचरज हुआ पर उन्होंने मायावी युद्ध जारी रखा.
भ्रमरों को हनुमान जी ने समाप्त कर दिया फिर भी हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों अहिरावण और महिरावण का अंत नहीं हो पा रहा था. यह देखकर हनुमान जी कुछ चिंतित हुए.
फिर उन्हें कामाक्षी देवी का वचन याद आया. देवी ने बताया था कि अहिरावण की सिद्धि है कि जब पांचो दीपकों एक साथ बुझेंगे तभी वे नए-नए रूप धारण करने में असमर्थ होंगे और उनका वध हो सकेगा.
हनुमान जी ने तत्काल पंचमुखी रूप धारण कर लिया. उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख.
उसके बाद हनुमान जी ने अपने पांचों मुख द्वारा एक साथ पांचों दीपक बुझा दिए. अब उनके बार बार पैदा होने और लंबे समय तक जिंदा रहने की सारी आशंकायें समाप्त हो गयीं थी. हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों शीघ्र ही दोनों राक्षस मारे गये.
इसके बाद उन्होंने श्री राम और लक्ष्मण जी की मूर्च्छा दूर करने के उपाय किए. दोनो भाई होश में आ गए. चित्रसेना भी वहां आ गई थी. हनुमान जी ने कहा- प्रभो ! अब आप अहिरावण और महिरावण के छल और बंधन से मुक्त हुए.
पर इसके लिए हमें इस नागकन्या की सहायता लेनी पड़ी थी. अहिरावण इसे बल पूर्वक उठा लाया था. वह आपसे विवाह करना चाहती है. कृपया उससे विवाह कर अपने साथ ले चलें. इससे उसे भी मुक्ति मिलेगी.
श्री राम हनुमान जी की बात सुनकर चकराए. इससे पहले कि वह कुछ कह पाते हनुमान जी ने ही कह दिया- भगवन आप तो मुक्तिदाता हैं. अहिरावण को मारने का भेद इसी ने बताया है. इसके बिना हम उसे मारकर आपको बचाने में सफल न हो पाते.
कृपा निधान इसे भी मुक्ति मिलनी चाहिए. परंतु आप चिंता न करें. हम सबका जीवन बचाने वाले के प्रति बस इतना कीजिए कि आप बस इस पलंग पर बैठिए बाकी का काम मैं संपन्न करवाता हूं.
हनुमान जी इतनी तेजी से सारे कार्य करते जा रहे थे कि इससे श्री राम जी और लक्ष्मण जी दोनों चिंता में पड़ गये. वह कोई कदम उठाते कि तब तक हनुमान जी ने भगवान राम की बांह पकड़ ली.
हनुमान जी ने भावा वेश में प्रभु श्री राम की बांह पकड़कर चित्रसेना के उस सजे-धजे विशाल पलंग पर बिठा दिया. श्री राम कुछ समझ पाते कि तभी पलंग की खोखली पाटी चरमरा कर टूट गयी.
पलंग धराशायी हो गया. चित्रसेना भी जमीन पर आ गिरी. हनुमान जी हंस पड़े और फिर चित्रसेना से बोले- अब तुम्हारी शर्त तो पूरी हुई नहीं, इसलिए यह विवाह नहीं हो सकता. तुम मुक्त हो और हम तुम्हें तुम्हारे लोक भेजने का प्रबंध करते हैं.
चित्रसेना समझ गयी कि उसके साथ छल हुआ है. उसने कहा कि उसके साथ छल हुआ है. मर्यादा पुरुषोत्तम के सेवक उनके सामने किसी के साथ छल करें यह तो बहुत अनुचित है. मैं हनुमान को श्राप दूंगी.
चित्रसेना हनुमान जी को श्राप देने ही जा हे रही थी कि श्री राम का सम्मोहन भंग हुआ. वह इस पूरे नाटक को समझ गये. उन्होंने चित्रसेना को समझाया- मैंने एक पत्नी धर्म से बंधे होने का संकल्प लिया है. इस लिए हनुमान जी को यह करना पड़ा. उन्हें क्षमा कर दो.
क्रुद्ध चित्रसेना तो उनसे विवाह की जिद पकड़े बैठी थी. श्री राम ने कहा- मैं जब द्वापर में श्री कृष्ण अवतार लूंगा तब तुम्हें सत्यभामा के रूप में अपनी पटरानी बनाउंगा. इससे वह मान गयी.
हनुमान जी ने चित्रसेना को उसके पिता के पास पहुंचा दिया. चित्रसेना को प्रभु ने अगले जन्म में पत्नी बनाने का वरदान दिया था. भगवान विष्णु की पत्नी बनने की चाह में उसने स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया.
श्री राम और लक्ष्मण, मकरध्वज और हनुमान जी सहित वापस लंका में सुवेल पर्वत पर लौट आये |
(स्कंद पुराण और आनंद रामायण के सारकांड की कथा)
जय श्री राम


शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

सावन सोमवार का महत्व

2017 में २७ बर्ष बाद सावन में बन रहा अदभुत् संयोग

गुरू पूर्णिमा पर गुरू की आराधना के बाद श्रद्धालु एक माह के लिए गुरूओं के गुरू भगवान शिव की पूजा मे लीन हो जायेगें गुरू पूर्णिमा ९ जुलाई की है और भगवान शिव का महीना माना जाने वाला सावन १० जुलाई से शुरू हो रहा है २७ बर्ष बाद एैसा संयोग बना है कि इस बार सावन भगवान शिव के दिन सोमवार को शुरू होगा और इसका समापन भी सोमवार को ही होगा १९९० में एैसा संयोग बना था इसे इन्दुवार हर्षण योग कहते है पूरे माह में इस बर्ष पांच सोमवार पड़ेगे इस बर्ष सावन माह में सोमवार व्रत का पुण्य हजारो गुना अधिक होगा और व्रती पर भगवान शिव की अक्षय कृपा बनी रहेगी।
पहला सोमवार-
दस जुलाई को सावन का पहला सोमवार है इस दिन उतराषाढ़ नक्षत्र और वैधृति योग है दिन के स्वामी चन्द्रमा पर देवगुरू वृहस्पति की पूर्ण दृष्टि है इसलिए इस दिन का व्रत ज्ञान वृद्धि के लिए सर्वोत्तम है इस दिन ब्रत करने से व्यापारिक कार्यो में भी समृद्धि का योग प्राप्त होगा।
दूसरा सोमवार-
 दूसरा सोमवार सत्रह जुलाई को पड़ेगा इस दिन अष्टमी तिथि अश्विनी नक्षत्र और धृति योग है स्वामी चन्द्रमा राज्य स्थान मे है इस दिन का ब्रत राज्कीय कार्यो में सफलता दिलाएगा।
तीसरा सोमवार-
तीसरा सोमवार चौबिस जुलाई को है इस दिन प्रतिप्रदा तिथि पुण्य नक्षत्र और सिद्धि योग है इस दिन का ब्रत दिन के स्वामी चन्द्रमा केंद्रगत शरीर पर होने से अरोग्ता व वंश वृद्धि के लिए उत्तम रहेगा।
चौथा सोमवार-
चौथा सोमवार ३१ जुलाई को है इस दिन अष्टमी तिथि स्वाती नक्षत्र और शुभ योग है दिन के स्वामी चन्द्रमा के भूमि,भवन व सुख के स्थान पर से दिन के ब्रत से भूमि,भवन व भौतिक सुख की प्राप्ति के योग है।
पांचवा सोमवार-
 सावन माह का पांचवा व अन्तिम सोमवार सात अगस्त को है इस दिन पूर्णिमा तिथि,श्रवण नक्षत्र और आयुष्मान योग है दिन का स्वामी चंन्द्रमा के सप्तम स्थानंगत होने से विवाह के योग बनेगे और दामपत्य जीवन में मधुरता व सुख का प्रवेश होगा।।    

सोमवार, 27 जुलाई 2015

कृत्तिका नक्षत्र



कृत्तिका नक्षत्र सात तारो का एक झुंड है।वास्तव मे यह अंगूरों का गुच्छा प्रतीत होता है।  कृत्तिका नक्षत्र  का प्रथम चरण मेष तथा शेष तीन चरण वृष राशि में है।कार्तिक मास की पूर्णिमा को चंद्रमा  कृत्तिका नक्षत्र में रहता है । इस नक्षत्र का स्वामी सूर्य तथा देव अग्नि है। यह नक्षत्र सतोगुणी की श्रेणी मे आता है। इस नक्षत्र मे सामान्य व अग्नि संबधी कार्य सिद्ध होते है। इस नक्षत्र मे कोई वस्तु खोने पर न तो उस वस्तु का सुराग लगता है और न ही वह वस्तु मिल पाती है ।
              कृत्तिका नक्षत्र से युक्त वारो में देवताओं का यजन-पूजन समस्त भोगों को देने वाला, व्याधियो को हर लेने वाला तथा भूतों और ग्रहों का विनाश करने वाला होता है।इस नक्षत्र मे प्रत्येक वार और तिथि आदि में पूजा का विशेष महत्व है।कृत्तिका नक्षत्र से युक्त हर वार का अपना महत्व है, जो इस प्रकार है-----
रविवार ----कृत्तिका नक्षत्र से युक्त रविवारो को भगवान सूर्य की पूजा करने तथा तेल और सूती वस्त्र देने से मनुष्यो के कोढ आदि का नाश होता है। ह्रर्रै, काली मिर्च, वस्त्र और खीरा आदि का दान और ब्राह्मणो की प्रतिष्ठा करने से क्षय के रोग का नाश होता है। दीप और सरसों के दान से मिरगी का रोग मिट जाता है।
सोमवार ----कृत्तिका नक्षत्र से युक्त सोमवारों को किया हुआ शिवजी का पूजन मनुष्यों के महान दारिद्रय को मिटाने वाला और सम्पूर्ण सम्पतियों को देने वाला है।घर की आवश्यक सामग्रियों के साथ गृह और क्षेत्र आदि का दान करने से भी उक्त फल की प्राप्ति होती है।
मंगलवार ----कृत्तिका नक्षत्र से युक्त मंगलवारो को श्रीस्कंद का पूजन करने से तथा दीपक एवं घण्टा आदि का दान देने से मनुष्यों को शीघ्र ही वाकसिद्धि प्राप्त होती है। उन के मुँह से निकली हुई हर बात सत्य होती है।
बुधवार ----कृत्तिका नक्षत्र से युक्त बुधवारो को किया हुआ श्रीविष्णु जी का यजन तथा दही- भात का दान मनुष्यो को उत्तम संतान की प्राप्ति कराने वाला होता है।
गुरुवार ----कृत्तिका नक्षत्र से युक्त गुरुवारो को धन से ब्रह्मा जी का पूजन तथा मधु, सोना और घी का दान करने से मनुष्यो के भोग- वैभव की वृद्धि होती है।
शुक्रवार ---- कृत्तिका नक्षत्र से युक्त शुक्रवारो को गजानन गणेश जी की पूजा करने से तथा गंध, पुष्प एवं अन्न का दान देने से मनुष्यो के भोग्य पदार्थो की वृद्धि होती है।उस दिन सोना, चांदी आदि का दान करने से बंध्या को भी उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है।

शनिवार ---- कृत्तिका नक्षत्र से युक्त शनिवारो को सेतुपालों का पूजन, त्रिनेत्रधारी रुद, पापहारी विष्णु तथा ज्ञानदाता ब्रह्मा की आराधना और धन्वंतरि एवं दोनो अश्विनी कुमारो का पूजन करने से रोग , दुर्मृत्यु एवं अकाल मृत्यु का निवारण होता है। साथ ही तात्कालिक व्याधियो की शंति हो जाती है। नमक, लोहा, तेल और उड्द आदि का  त्रिकुट (सोंठ, पीपल और गोलमिर्च) फल, गंध और जल आदि का तथा घृत आदि द्रव-पदार्थो का और सुवर्ण, मोती आदि कठोर वस्तुओं का भी दान देने से स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।     


चित्र-- गुगल साभार

शुक्रवार, 26 जून 2015

प्रदोष व्रत

     
यह व्रत सर्वकार्य सिद्धि व पापो को नाश करने वाला है। प्रदोष का अर्थ रात का शुभांरभ होता है।सूर्यास्त होने के बाद जब संध्याकाल होता है तो रात के शुरू होने की पूर्व बेला को ही प्रदोषकाल कहते है। प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को जो दिन होता है उसी दिन के नाम के अनुसार प्रदोष व्रत मानते है। हर प्रदोष व्रत के फल अलग-अलग होते है।
रवि प्रदोष व्रत---इस व्रत से अतिशीघ्र कार्यसिद्धि के साथ अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है तथा सहस्त्र गोदान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है । यह व्रत सर्वकार्य सिद्ध, सुख-समृद्धि, सदैव आरोग्यता तथा दीर्घायु हेतु किया जाता है।
सोम प्रदोष व्रत---इस व्रत से हमे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। अभीष्ट फल की प्राप्ति तथा आरोग्यता हेतु सोम प्रदोष व्रत का बहुत महत्व है।
मंगल प्रदोष व्रत्‌‌---इस व्रत से पापों से मुक्ति मिलती है। अच्छे स्वास्थ्य तथा दुर्घटना से मुक्ति के लिए इस व्रत को किया जाता है।
बुध प्रदोष व्रत---यह व्रत सभी प्रकार की कामना सिद्धि, वाक् सिद्धि, विद्या प्राप्ति व गभ्भीर संकट दूर करने हेतु किया जाता है।   
गुरु प्रदोष व्रत---आर्थिक लाभ, सौभाग्य वृद्धि, प्रत्येक कार्य में सफलता तथा अच्छे स्वास्थ्य लाभ हेतु किया जाता है।
शुक्र प्रदोष व्रत---इस व्रत को स्त्री के सौभाग्य हेतु किया जाता है। सुख-समृद्धि, भौतिक सुख व कल्याण हेतु इस व्रत को किया जाता है।
शनि प्रदोष व्रत---इस व्रत से निर्धनता समाप्त होती है। जीवन में जो बाधायें है वह दूर होती है। पुत्र प्राप्ति तथा रोग मुक्ति हेतु भी इस व्रत को किया जाता है।
     सर्वकार्य हेतु शास्त्रों मे कहा गया है कि यदि कोई भी 11 अथवा एक वर्ष के समस्त त्रयोदशी के व्रत करता है तो उसकी समस्त मनोकामनायें पूर्ण होती है। प्रदोष के व्रत से भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर अंत में उपासक परम आनंद के साथ परम पद प्राप्त करता है। जो प्रदोष व्रत करता है अथवा श्रवण करता है तथा भगवान शिव की पूजा-अर्चना करता है ,वह भौतिक जीवन मे कार्य सिद्धि, ज्ञान, ऐश्वर्य,रोगमुक्ति तथा सुख भोग कर अंत में शिव लोक को जाता है।
  


चित्र -गूगल साभार 
           




मंगलवार, 20 अगस्त 2013

रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त


रक्षा बन्धन का पर्व प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को देश भर में मनाया जाता है।इस बार 2013 में यह पर्व 20 और 21 अगस्त दो दिन मनाया जा रहा है। इस से पहले यह संयोग 14 अगस्त 1973  में बना था 20 अगस्त को सुबह 10:22 बजे से शुरु है लेकिन साथ ही में भद्रा भी शुरु हो रही है।जो रात को 8 बजकर 49 मिनट पर समाप्त हो जायेगी। भद्रा को विष्टिकरण के नाम से भी जाना जाता है।भद्रा शनि की बहन तथा सूर्य की पत्नी छाया से उत्पन्न है।चन्द्रमा जब मेष,वृष,मिथुन,वृश्चिक मे हो तो उस समय भद्रा का वास स्वर्ग मे ,कन्या,तुला,धनु,मकर में हो तो पाताल-लोक में तथा कर्क,सिंह,कुभ्भ,मीन में हो तो मृ्त्यु लोक में भद्रा का वास होता है ।शास्त्रो के अनुसार कोई भी शुभ कार्य भद्रा में नही किया जाता है। ग्रह नक्षत्रों तथा तिथि के आगे पीछे होने से ऎसे संयोग बनते है।आने वाले वर्षो में यह संयोग 2022 में दिखेगा ।कहा जाता है कि रावण की बहन सूर्पनखा ने भद्रा के दौरान रावण को राखी बाधी थी जिससे उस का एक साल के अंदर अंत हो गया श्रावण पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी बाँधी थी।जिस के कारण देवासुर संग्राम में इंद्र की पराजय हुई तब देवता के गुरु बृहस्पति ने इंद्र के हाथ पर रक्षा सूत्र बांधा था, जिसके कारण इंद्र की विजय हुई।
श्रावण मास की पूर्णिमा उदया तिथि बुधवार् 21 को पड रही है।उदया तिथि को पर्व बनाने की परंपरा रही है इसलिए बुधवार को ही रक्षाबन्धन का पर्व बनाना चाहिए।
आप इस मंत्र से भाई के हाथ पर राखी बाँध सकती है---

मन्त्र :-
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनु बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
यह मंत्र रक्षा कवच की तरह काम करता है और भाईयो की उम्र मे भी वृद्धि होती है।

आप बुधवार 21.8.2013 को इस चौघडिया से भी राखी बाँध सकते है।

सुबह -6 से 7:30 बजे तक…….लाभ
7:30 से 09:00 बजे तक……..अमृत
10:30 से 12:00 बजे तक….शुभ
शाम 04:30 से 06:00 तक….लाभ 

चित्र -गूगल साभार 

मंगलवार, 5 मार्च 2013

स्वंय भू प्रकट आद शिवलिंग, काठगढ



स्वंय भू प्रकट आद शिवलिंग

कुछ दिन पहले प्रभु कृपा से श्री सदाशिव महादेव जी के मंदिर जाना का मौका मिला । यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के जिला कांगडा में स्थित काठगढ नामक स्थान में स्थित है।10 मार्च 2013 को महाशिवरात्रि है। ऎसा कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन दोनो स्तंभ्भ आपस में  जुड जाते है। मंदिर में जाने के लिए सीढियां बनी हुई है। फिर आगे बडा प्रांगण है । जिस के आगे महादेव जी का मंदिर है । जहाँ शिव-शक्ति के रुप में विशाल लिंग है।  स्वयं भू-प्रकट इस शिवलिंग का वर्णन शिव पुराण में भी है। दो भागो में विभाजित यह शिवलिंग प्रिया-प्रियतम रुप शक्ति और शिव का स्वरुप है । लिंग में प्रतिष्ठित भगवान शिव-शिवा भोग और मोक्ष को देने वाले है । इस में ऊँचा आकार शिव का और छोटा आकार पार्वती माँ का प्रतीक है । इन दोनो भागों के बीच का अन्तर ग्रहों तथा नक्षत्रों के अनुरुप घटता-बढता रहता है।

 शिव पुराण अनुसार जब श्री ब्रह्मा जी व विष्णु जी में विवाद अपने आप को बढे होने को ले कर हुआ,जिस के कारण दोनो में युद्ध हुआ । तब दोनो एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। यह देख भगवान सदाशिव ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच में एक महान अग्नि स्तभ्भ के रुप में प्रकट हुए। तब ब्रह्मा जी ने हंस का रुप धारण कर आकाश की ओर गमन किया तथा विष्णु जी ने शूकर का रुप धारण कर उस अग्नि स्तभ्भ का मूल देखने पाताल मे बहुत दूर तक चले गये। कई वर्षो तक जब स्तभ्भ के ओर-छोर का पता नही चला तब ब्रह्मा जी आकाश से केतकी का फूल लेकर विष्णु जी के पास आए और बोले कि मै स्तभ्भ का शीर्ष देख आया हूँ। जिसके ऊपर केतकी का फूल था। तब  श्री विष्णु जी ने ब्रह्मा जी के चरण पकड लिये। तब इस छल को देखकर महादेव जी उमादेवी जी के साथ उस अग्नि रुपी स्तभ्भ में से प्रकट हुए और विष्णु जी की सत्यवादिता पर प्रसन्न हो कर विष्णु जी को अपनी समानता प्रदान की। तब भगवान सदाशिव के दर्शन पाकर श्री विष्णु जी ने उन्हे प्रणाम कर ऊपर की ओर देखा तो उस समय पाँच कलाओ से युक्त ऊँ कार जनित मंत्र का साक्षात्कार हुआ। तब महादेव जी का 'ऊँ तत्वमसि ' यह महावाक्य दृ्ष्टि गोचर हुआ। जो परम् उत्तम मंत्र रुप है तथा शुध्द है। शिवलिग के दक्षिण भाग में सनातन आदि वर्ण अकार जो सूर्य मंडल के समान तेजोमय सृष्टिकर्ता है जिसे बीज् कहते है। उत्तर भाग में उकार का जो अग्नि के समान दीप्तिशाली है,जिसे योनि कहते है। मध्य भाग मकार जो चंद्र मंडल के समान उज्जवल कान्ति से प्रकाशमान है। जिसे बीज मंत्र के स्वामी कहते है। अकार सृष्टिकर्ता है, उकार मोह में डालने वाला तथा मकार नित्य अनुग्रह करने वाला है। इस प्रकार '','' ,और '' इन त्रिविध रुपों में वर्णित ओउम ऎसा कहा गया है। शिवलिंग के मूल में श्री ब्रह्मा जी, मध्य मे श्री विष्णु जी और ऊपर स्वंय भगवान शिव निवास करते है। देवी पार्वती जी और् लिंग महादेव के रुप है इसलिए शिवलिंग का पूजन करने से त्रिदेवो और आदि शक्ति की पूजा स्वत: हो जाती है।  ऊँ हर हर महादेव...

 चित्र- अपने कैमरे से 



शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

अंक शास्त्र

अंक शास्त्र हमारे वेदों, उपनिषदों में से निकली हूई एक शाखा है हमारा धार्मिक जीवन हो या भौतिक जीवन सभी में अंको का स्थान सर्वोपरि है। मालाओं की संख्या,नौ ग्रह,नक्षत्रों की संख्या,मंत्रो की संख्या आदि सभी में अंको की प्रधानता है ।साल,सप्ताह,महीने,वार सभी में अंको की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।यहाँ तक कि हमारे जीवन की साँसों का लेखा-जोखा सभी अंको की गिनती पर निर्भर है।तभी तो  पुराने समय में ये ऋषि-मुनि अपने योग द्धारा अपनी सांसो को नियंत्रित कर कितने-कितने वर्षो तक जीवित रहते थे। जब हम जन्म लेते है तो दिन,वार,महीना,साल उसी संख्या से हमारे कर्म और भाग्य का मार्ग विदित हो जाता है  
पाँच तत्व, (पृथ्वी,आग,जल,वायु,आकाश) पाँच द्रव्य (मिट्टी,लकडी,धातु,आग,जल),पँच परमेश्वर यह पाँच अंक हमारे जीवन में जीवन और मृत्यु से संबधित है।जिसे हम अलग नही कर सकते। हर संख्या में एक गहरा रहस्य छिपा है परमात्मा की यह सृष्टि खुद एक रहस्य है और इस रहस्य को समझने में अंक हमारे मददगार रहते है। जिस तरह लाभ-हानि,मित्र-शत्रु,तथा उतार-चढाव जीवन में आते है,उन सब में हम अपने मित्र अंको की मदद द्धारा उन परेशानियों से मुक्त हो इस भवसागर से पार उतर सकते है पाइथागोरस ने भी कहा है-"सभी रचनाओ,स्वरुपों और विचारों का स्वामी अंक है और यही देवताओं और राक्षसों का जनक है।" शून्य (0) जो निराकार ब्रह्र्म का प्रतीक है। शून्य से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई और शून्य में ही एक दिन सब विलीन हो जायेगा ।सच पूछा जाएँ तो शून्य का अंक बहुत महत्वपूर्ण है,इस के बिना अन्य अंक पंगु है।हर अंक का प्रकृति के साथ कुछ कुछ गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है। शून्य का अंक अगर अंनत स्वरुप है तो एक (1) का अंक ब्रह्र्म का, दो (2) का अंक अर्धनरीश्वर ,तीन (3) का अंक त्रिशक्ति का, चार (4) का अंक स्वातिक का, पाँच (5) का अंक पंच तत्व का, छः (6) का अंक रस का, सात (7) का अंक सप्तऋषि का, आठ (8) का अंक अष्ट भैरव, नौ (9) का अंक नौ देवियों का स्वरुप है। हमारा नाम जो हमारी पहचान है उस का अंक भी हमारे जीवन के सुख-दुख तथा भाग्य का निर्माण करता है ।शब्द और अंक का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है आप भी अपने मित्र-शत्रु अंको को ज्ञात कर जीवन सुखमय कर सकते है जिस प्रकार डाक्टर से दवाई लेकर रोगी अपना रोग ठीक करता है, उसी प्रकार से अंको के ज्ञान द्धारा मनुष्य अपनी आने वाली हर समस्याओ तथा परेशानी से निजात पा सकता है अंको के सागर को जो जान लेता है ,वह जीवन की हर गति,लय,क्रम को सुन सकता है

चित्र गूगल साभार 

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