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सोमवार, 27 जुलाई 2015

कृत्तिका नक्षत्र



कृत्तिका नक्षत्र सात तारो का एक झुंड है।वास्तव मे यह अंगूरों का गुच्छा प्रतीत होता है।  कृत्तिका नक्षत्र  का प्रथम चरण मेष तथा शेष तीन चरण वृष राशि में है।कार्तिक मास की पूर्णिमा को चंद्रमा  कृत्तिका नक्षत्र में रहता है । इस नक्षत्र का स्वामी सूर्य तथा देव अग्नि है। यह नक्षत्र सतोगुणी की श्रेणी मे आता है। इस नक्षत्र मे सामान्य व अग्नि संबधी कार्य सिद्ध होते है। इस नक्षत्र मे कोई वस्तु खोने पर न तो उस वस्तु का सुराग लगता है और न ही वह वस्तु मिल पाती है ।
              कृत्तिका नक्षत्र से युक्त वारो में देवताओं का यजन-पूजन समस्त भोगों को देने वाला, व्याधियो को हर लेने वाला तथा भूतों और ग्रहों का विनाश करने वाला होता है।इस नक्षत्र मे प्रत्येक वार और तिथि आदि में पूजा का विशेष महत्व है।कृत्तिका नक्षत्र से युक्त हर वार का अपना महत्व है, जो इस प्रकार है-----
रविवार ----कृत्तिका नक्षत्र से युक्त रविवारो को भगवान सूर्य की पूजा करने तथा तेल और सूती वस्त्र देने से मनुष्यो के कोढ आदि का नाश होता है। ह्रर्रै, काली मिर्च, वस्त्र और खीरा आदि का दान और ब्राह्मणो की प्रतिष्ठा करने से क्षय के रोग का नाश होता है। दीप और सरसों के दान से मिरगी का रोग मिट जाता है।
सोमवार ----कृत्तिका नक्षत्र से युक्त सोमवारों को किया हुआ शिवजी का पूजन मनुष्यों के महान दारिद्रय को मिटाने वाला और सम्पूर्ण सम्पतियों को देने वाला है।घर की आवश्यक सामग्रियों के साथ गृह और क्षेत्र आदि का दान करने से भी उक्त फल की प्राप्ति होती है।
मंगलवार ----कृत्तिका नक्षत्र से युक्त मंगलवारो को श्रीस्कंद का पूजन करने से तथा दीपक एवं घण्टा आदि का दान देने से मनुष्यों को शीघ्र ही वाकसिद्धि प्राप्त होती है। उन के मुँह से निकली हुई हर बात सत्य होती है।
बुधवार ----कृत्तिका नक्षत्र से युक्त बुधवारो को किया हुआ श्रीविष्णु जी का यजन तथा दही- भात का दान मनुष्यो को उत्तम संतान की प्राप्ति कराने वाला होता है।
गुरुवार ----कृत्तिका नक्षत्र से युक्त गुरुवारो को धन से ब्रह्मा जी का पूजन तथा मधु, सोना और घी का दान करने से मनुष्यो के भोग- वैभव की वृद्धि होती है।
शुक्रवार ---- कृत्तिका नक्षत्र से युक्त शुक्रवारो को गजानन गणेश जी की पूजा करने से तथा गंध, पुष्प एवं अन्न का दान देने से मनुष्यो के भोग्य पदार्थो की वृद्धि होती है।उस दिन सोना, चांदी आदि का दान करने से बंध्या को भी उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है।

शनिवार ---- कृत्तिका नक्षत्र से युक्त शनिवारो को सेतुपालों का पूजन, त्रिनेत्रधारी रुद, पापहारी विष्णु तथा ज्ञानदाता ब्रह्मा की आराधना और धन्वंतरि एवं दोनो अश्विनी कुमारो का पूजन करने से रोग , दुर्मृत्यु एवं अकाल मृत्यु का निवारण होता है। साथ ही तात्कालिक व्याधियो की शंति हो जाती है। नमक, लोहा, तेल और उड्द आदि का  त्रिकुट (सोंठ, पीपल और गोलमिर्च) फल, गंध और जल आदि का तथा घृत आदि द्रव-पदार्थो का और सुवर्ण, मोती आदि कठोर वस्तुओं का भी दान देने से स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।     


चित्र-- गुगल साभार

शुक्रवार, 26 जून 2015

प्रदोष व्रत

     
यह व्रत सर्वकार्य सिद्धि व पापो को नाश करने वाला है। प्रदोष का अर्थ रात का शुभांरभ होता है।सूर्यास्त होने के बाद जब संध्याकाल होता है तो रात के शुरू होने की पूर्व बेला को ही प्रदोषकाल कहते है। प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को जो दिन होता है उसी दिन के नाम के अनुसार प्रदोष व्रत मानते है। हर प्रदोष व्रत के फल अलग-अलग होते है।
रवि प्रदोष व्रत---इस व्रत से अतिशीघ्र कार्यसिद्धि के साथ अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है तथा सहस्त्र गोदान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है । यह व्रत सर्वकार्य सिद्ध, सुख-समृद्धि, सदैव आरोग्यता तथा दीर्घायु हेतु किया जाता है।
सोम प्रदोष व्रत---इस व्रत से हमे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। अभीष्ट फल की प्राप्ति तथा आरोग्यता हेतु सोम प्रदोष व्रत का बहुत महत्व है।
मंगल प्रदोष व्रत्‌‌---इस व्रत से पापों से मुक्ति मिलती है। अच्छे स्वास्थ्य तथा दुर्घटना से मुक्ति के लिए इस व्रत को किया जाता है।
बुध प्रदोष व्रत---यह व्रत सभी प्रकार की कामना सिद्धि, वाक् सिद्धि, विद्या प्राप्ति व गभ्भीर संकट दूर करने हेतु किया जाता है।   
गुरु प्रदोष व्रत---आर्थिक लाभ, सौभाग्य वृद्धि, प्रत्येक कार्य में सफलता तथा अच्छे स्वास्थ्य लाभ हेतु किया जाता है।
शुक्र प्रदोष व्रत---इस व्रत को स्त्री के सौभाग्य हेतु किया जाता है। सुख-समृद्धि, भौतिक सुख व कल्याण हेतु इस व्रत को किया जाता है।
शनि प्रदोष व्रत---इस व्रत से निर्धनता समाप्त होती है। जीवन में जो बाधायें है वह दूर होती है। पुत्र प्राप्ति तथा रोग मुक्ति हेतु भी इस व्रत को किया जाता है।
     सर्वकार्य हेतु शास्त्रों मे कहा गया है कि यदि कोई भी 11 अथवा एक वर्ष के समस्त त्रयोदशी के व्रत करता है तो उसकी समस्त मनोकामनायें पूर्ण होती है। प्रदोष के व्रत से भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर अंत में उपासक परम आनंद के साथ परम पद प्राप्त करता है। जो प्रदोष व्रत करता है अथवा श्रवण करता है तथा भगवान शिव की पूजा-अर्चना करता है ,वह भौतिक जीवन मे कार्य सिद्धि, ज्ञान, ऐश्वर्य,रोगमुक्ति तथा सुख भोग कर अंत में शिव लोक को जाता है।
  


चित्र -गूगल साभार 
           




मंगलवार, 20 अगस्त 2013

रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त


रक्षा बन्धन का पर्व प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को देश भर में मनाया जाता है।इस बार 2013 में यह पर्व 20 और 21 अगस्त दो दिन मनाया जा रहा है। इस से पहले यह संयोग 14 अगस्त 1973  में बना था 20 अगस्त को सुबह 10:22 बजे से शुरु है लेकिन साथ ही में भद्रा भी शुरु हो रही है।जो रात को 8 बजकर 49 मिनट पर समाप्त हो जायेगी। भद्रा को विष्टिकरण के नाम से भी जाना जाता है।भद्रा शनि की बहन तथा सूर्य की पत्नी छाया से उत्पन्न है।चन्द्रमा जब मेष,वृष,मिथुन,वृश्चिक मे हो तो उस समय भद्रा का वास स्वर्ग मे ,कन्या,तुला,धनु,मकर में हो तो पाताल-लोक में तथा कर्क,सिंह,कुभ्भ,मीन में हो तो मृ्त्यु लोक में भद्रा का वास होता है ।शास्त्रो के अनुसार कोई भी शुभ कार्य भद्रा में नही किया जाता है। ग्रह नक्षत्रों तथा तिथि के आगे पीछे होने से ऎसे संयोग बनते है।आने वाले वर्षो में यह संयोग 2022 में दिखेगा ।कहा जाता है कि रावण की बहन सूर्पनखा ने भद्रा के दौरान रावण को राखी बाधी थी जिससे उस का एक साल के अंदर अंत हो गया श्रावण पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी बाँधी थी।जिस के कारण देवासुर संग्राम में इंद्र की पराजय हुई तब देवता के गुरु बृहस्पति ने इंद्र के हाथ पर रक्षा सूत्र बांधा था, जिसके कारण इंद्र की विजय हुई।
श्रावण मास की पूर्णिमा उदया तिथि बुधवार् 21 को पड रही है।उदया तिथि को पर्व बनाने की परंपरा रही है इसलिए बुधवार को ही रक्षाबन्धन का पर्व बनाना चाहिए।
आप इस मंत्र से भाई के हाथ पर राखी बाँध सकती है---

मन्त्र :-
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनु बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
यह मंत्र रक्षा कवच की तरह काम करता है और भाईयो की उम्र मे भी वृद्धि होती है।

आप बुधवार 21.8.2013 को इस चौघडिया से भी राखी बाँध सकते है।

सुबह -6 से 7:30 बजे तक…….लाभ
7:30 से 09:00 बजे तक……..अमृत
10:30 से 12:00 बजे तक….शुभ
शाम 04:30 से 06:00 तक….लाभ 

चित्र -गूगल साभार 

मंगलवार, 5 मार्च 2013

स्वंय भू प्रकट आद शिवलिंग, काठगढ



स्वंय भू प्रकट आद शिवलिंग

कुछ दिन पहले प्रभु कृपा से श्री सदाशिव महादेव जी के मंदिर जाना का मौका मिला । यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के जिला कांगडा में स्थित काठगढ नामक स्थान में स्थित है।10 मार्च 2013 को महाशिवरात्रि है। ऎसा कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन दोनो स्तंभ्भ आपस में  जुड जाते है। मंदिर में जाने के लिए सीढियां बनी हुई है। फिर आगे बडा प्रांगण है । जिस के आगे महादेव जी का मंदिर है । जहाँ शिव-शक्ति के रुप में विशाल लिंग है।  स्वयं भू-प्रकट इस शिवलिंग का वर्णन शिव पुराण में भी है। दो भागो में विभाजित यह शिवलिंग प्रिया-प्रियतम रुप शक्ति और शिव का स्वरुप है । लिंग में प्रतिष्ठित भगवान शिव-शिवा भोग और मोक्ष को देने वाले है । इस में ऊँचा आकार शिव का और छोटा आकार पार्वती माँ का प्रतीक है । इन दोनो भागों के बीच का अन्तर ग्रहों तथा नक्षत्रों के अनुरुप घटता-बढता रहता है।

 शिव पुराण अनुसार जब श्री ब्रह्मा जी व विष्णु जी में विवाद अपने आप को बढे होने को ले कर हुआ,जिस के कारण दोनो में युद्ध हुआ । तब दोनो एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। यह देख भगवान सदाशिव ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच में एक महान अग्नि स्तभ्भ के रुप में प्रकट हुए। तब ब्रह्मा जी ने हंस का रुप धारण कर आकाश की ओर गमन किया तथा विष्णु जी ने शूकर का रुप धारण कर उस अग्नि स्तभ्भ का मूल देखने पाताल मे बहुत दूर तक चले गये। कई वर्षो तक जब स्तभ्भ के ओर-छोर का पता नही चला तब ब्रह्मा जी आकाश से केतकी का फूल लेकर विष्णु जी के पास आए और बोले कि मै स्तभ्भ का शीर्ष देख आया हूँ। जिसके ऊपर केतकी का फूल था। तब  श्री विष्णु जी ने ब्रह्मा जी के चरण पकड लिये। तब इस छल को देखकर महादेव जी उमादेवी जी के साथ उस अग्नि रुपी स्तभ्भ में से प्रकट हुए और विष्णु जी की सत्यवादिता पर प्रसन्न हो कर विष्णु जी को अपनी समानता प्रदान की। तब भगवान सदाशिव के दर्शन पाकर श्री विष्णु जी ने उन्हे प्रणाम कर ऊपर की ओर देखा तो उस समय पाँच कलाओ से युक्त ऊँ कार जनित मंत्र का साक्षात्कार हुआ। तब महादेव जी का 'ऊँ तत्वमसि ' यह महावाक्य दृ्ष्टि गोचर हुआ। जो परम् उत्तम मंत्र रुप है तथा शुध्द है। शिवलिग के दक्षिण भाग में सनातन आदि वर्ण अकार जो सूर्य मंडल के समान तेजोमय सृष्टिकर्ता है जिसे बीज् कहते है। उत्तर भाग में उकार का जो अग्नि के समान दीप्तिशाली है,जिसे योनि कहते है। मध्य भाग मकार जो चंद्र मंडल के समान उज्जवल कान्ति से प्रकाशमान है। जिसे बीज मंत्र के स्वामी कहते है। अकार सृष्टिकर्ता है, उकार मोह में डालने वाला तथा मकार नित्य अनुग्रह करने वाला है। इस प्रकार '','' ,और '' इन त्रिविध रुपों में वर्णित ओउम ऎसा कहा गया है। शिवलिंग के मूल में श्री ब्रह्मा जी, मध्य मे श्री विष्णु जी और ऊपर स्वंय भगवान शिव निवास करते है। देवी पार्वती जी और् लिंग महादेव के रुप है इसलिए शिवलिंग का पूजन करने से त्रिदेवो और आदि शक्ति की पूजा स्वत: हो जाती है।  ऊँ हर हर महादेव...

 चित्र- अपने कैमरे से 



शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

अंक शास्त्र

अंक शास्त्र हमारे वेदों, उपनिषदों में से निकली हूई एक शाखा है हमारा धार्मिक जीवन हो या भौतिक जीवन सभी में अंको का स्थान सर्वोपरि है। मालाओं की संख्या,नौ ग्रह,नक्षत्रों की संख्या,मंत्रो की संख्या आदि सभी में अंको की प्रधानता है ।साल,सप्ताह,महीने,वार सभी में अंको की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।यहाँ तक कि हमारे जीवन की साँसों का लेखा-जोखा सभी अंको की गिनती पर निर्भर है।तभी तो  पुराने समय में ये ऋषि-मुनि अपने योग द्धारा अपनी सांसो को नियंत्रित कर कितने-कितने वर्षो तक जीवित रहते थे। जब हम जन्म लेते है तो दिन,वार,महीना,साल उसी संख्या से हमारे कर्म और भाग्य का मार्ग विदित हो जाता है  
पाँच तत्व, (पृथ्वी,आग,जल,वायु,आकाश) पाँच द्रव्य (मिट्टी,लकडी,धातु,आग,जल),पँच परमेश्वर यह पाँच अंक हमारे जीवन में जीवन और मृत्यु से संबधित है।जिसे हम अलग नही कर सकते। हर संख्या में एक गहरा रहस्य छिपा है परमात्मा की यह सृष्टि खुद एक रहस्य है और इस रहस्य को समझने में अंक हमारे मददगार रहते है। जिस तरह लाभ-हानि,मित्र-शत्रु,तथा उतार-चढाव जीवन में आते है,उन सब में हम अपने मित्र अंको की मदद द्धारा उन परेशानियों से मुक्त हो इस भवसागर से पार उतर सकते है पाइथागोरस ने भी कहा है-"सभी रचनाओ,स्वरुपों और विचारों का स्वामी अंक है और यही देवताओं और राक्षसों का जनक है।" शून्य (0) जो निराकार ब्रह्र्म का प्रतीक है। शून्य से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई और शून्य में ही एक दिन सब विलीन हो जायेगा ।सच पूछा जाएँ तो शून्य का अंक बहुत महत्वपूर्ण है,इस के बिना अन्य अंक पंगु है।हर अंक का प्रकृति के साथ कुछ कुछ गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है। शून्य का अंक अगर अंनत स्वरुप है तो एक (1) का अंक ब्रह्र्म का, दो (2) का अंक अर्धनरीश्वर ,तीन (3) का अंक त्रिशक्ति का, चार (4) का अंक स्वातिक का, पाँच (5) का अंक पंच तत्व का, छः (6) का अंक रस का, सात (7) का अंक सप्तऋषि का, आठ (8) का अंक अष्ट भैरव, नौ (9) का अंक नौ देवियों का स्वरुप है। हमारा नाम जो हमारी पहचान है उस का अंक भी हमारे जीवन के सुख-दुख तथा भाग्य का निर्माण करता है ।शब्द और अंक का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है आप भी अपने मित्र-शत्रु अंको को ज्ञात कर जीवन सुखमय कर सकते है जिस प्रकार डाक्टर से दवाई लेकर रोगी अपना रोग ठीक करता है, उसी प्रकार से अंको के ज्ञान द्धारा मनुष्य अपनी आने वाली हर समस्याओ तथा परेशानी से निजात पा सकता है अंको के सागर को जो जान लेता है ,वह जीवन की हर गति,लय,क्रम को सुन सकता है

चित्र गूगल साभार 

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