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शुक्रवार, 26 जून 2015

प्रदोष व्रत

     
यह व्रत सर्वकार्य सिद्धि व पापो को नाश करने वाला है। प्रदोष का अर्थ रात का शुभांरभ होता है।सूर्यास्त होने के बाद जब संध्याकाल होता है तो रात के शुरू होने की पूर्व बेला को ही प्रदोषकाल कहते है। प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को जो दिन होता है उसी दिन के नाम के अनुसार प्रदोष व्रत मानते है। हर प्रदोष व्रत के फल अलग-अलग होते है।
रवि प्रदोष व्रत---इस व्रत से अतिशीघ्र कार्यसिद्धि के साथ अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है तथा सहस्त्र गोदान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है । यह व्रत सर्वकार्य सिद्ध, सुख-समृद्धि, सदैव आरोग्यता तथा दीर्घायु हेतु किया जाता है।
सोम प्रदोष व्रत---इस व्रत से हमे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। अभीष्ट फल की प्राप्ति तथा आरोग्यता हेतु सोम प्रदोष व्रत का बहुत महत्व है।
मंगल प्रदोष व्रत्‌‌---इस व्रत से पापों से मुक्ति मिलती है। अच्छे स्वास्थ्य तथा दुर्घटना से मुक्ति के लिए इस व्रत को किया जाता है।
बुध प्रदोष व्रत---यह व्रत सभी प्रकार की कामना सिद्धि, वाक् सिद्धि, विद्या प्राप्ति व गभ्भीर संकट दूर करने हेतु किया जाता है।   
गुरु प्रदोष व्रत---आर्थिक लाभ, सौभाग्य वृद्धि, प्रत्येक कार्य में सफलता तथा अच्छे स्वास्थ्य लाभ हेतु किया जाता है।
शुक्र प्रदोष व्रत---इस व्रत को स्त्री के सौभाग्य हेतु किया जाता है। सुख-समृद्धि, भौतिक सुख व कल्याण हेतु इस व्रत को किया जाता है।
शनि प्रदोष व्रत---इस व्रत से निर्धनता समाप्त होती है। जीवन में जो बाधायें है वह दूर होती है। पुत्र प्राप्ति तथा रोग मुक्ति हेतु भी इस व्रत को किया जाता है।
     सर्वकार्य हेतु शास्त्रों मे कहा गया है कि यदि कोई भी 11 अथवा एक वर्ष के समस्त त्रयोदशी के व्रत करता है तो उसकी समस्त मनोकामनायें पूर्ण होती है। प्रदोष के व्रत से भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर अंत में उपासक परम आनंद के साथ परम पद प्राप्त करता है। जो प्रदोष व्रत करता है अथवा श्रवण करता है तथा भगवान शिव की पूजा-अर्चना करता है ,वह भौतिक जीवन मे कार्य सिद्धि, ज्ञान, ऐश्वर्य,रोगमुक्ति तथा सुख भोग कर अंत में शिव लोक को जाता है।
  


चित्र -गूगल साभार 
           




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