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मंगलवार, 28 सितंबर 2010

पितृपक्ष अर्थात श्राद्ध पक्ष

पितृपक्ष अर्थात श्राद्धपक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक रहते है।इसमें पितरों का तर्पण किया जाता है।श्राद्ध के द्वारा पितृ- ऋण से निवृति प्राप्त होती है।दिवंगत पूर्वजों की तिथि पर उनके निमित ब्राह्मणों को भोजन करा देने से हमारे पितृ खुश हो जाते है।पुरुष की तिथि पर ब्राह्मण को और स्त्री की तिथि पर ब्राह्मणी को भोजन कराया जाता है।भोजन कराने के बाद यथा शक्ति दान-दक्षिणा,वस्त्र देना चाहिए। दिवंगत पूर्वजों की प्रसन्नता ही पितृ ऋण से मुक्त करा देती है।इसे पार्वण श्राद्ध कहते है। पार्वण श्राद्ध के लिए अपराह्ण व्यापिनी तिथि ली जाती है। जिसकी मृत्यु की तिथि का पता न हो उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।श्राद्ध भोजन का समय दोपहर का होता है। जिसे कुतुप बेला कहते है।अमावस्या के दिन हमारे पितृगण वायु रुप में हमारे घर के दरवाजे पर उपस्थित रहते है और अपने स्वजनो से श्राद्ध की अभिलाषा करते है।जब तक सुर्य अस्त नही हो जाता तब तक वे वही भूख-प्यास से व्याकुल होकर खडे रहते है। जो श्राद्ध करते है वे उन्हे आयु ,पुत्र ,यश , कीर्ति , सुख ,धन और धान्य आदि का आर्शीवाद दे अपने लोक को चले जाते है।देवताओ से पहले पितरो को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी होता है।देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व होता है। वायु पुराण ,मत्स्य पुराण ,गरुण पुराण, विष्णु पुराण आदि पुराणों तथा अन्य शास्त्रों जैसे मनुस्मृति इत्यादि में भी श्राद्ध कर्म के महत्व के बारे में बताया गया है।श्राद्ध मे तिल बहुत पवित्र माने जाते है। तिल का प्रयोग करने पर असुर ,दानव और दैत्य भाग जाते है। एक ही तिल का दान स्वर्ण के बत्तीस सेर तिल के समान है।तिल तथा कुश की उत्पत्ति विष्णु जी के शरीर से हुई थी ।तिल विष्णु जी के पसीने से उत्पन्न हुए है तथा कुश की उत्पत्ति विष्णु जी के रोमों से हुई है इसलिए पितृकार्य में इसका विशेष महत्व होता है। कुश के मूल भाग में ब्रह्मा ,मध्य भाग में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास माना जाता है।श्राद्ध प्रेतजनों को जिस प्रकार से तृप्ति प्रदान करता है उस के लिए भगवान विष्णुजी ने कहा है कि "मनुष्य अपने कर्मानुसार यदि देवता हो जाता है तो श्राद्धान्न अमृत होकर उसे प्राप्त होता है और् वही अन्न गन्धर्व योनि में भोग रुप से तथा पशु योनि में तृणरुप में,नाग योनि में वायुरुप से,पक्षी योनि में जलरुप से और राक्षस योनि मे आमिष तथा दानव योनि के लिए मांस, प्रेत के लिए रक्त,मनुष्य के लिये अन्न-पानादि और बाल्यावस्था में भोग रस हो जाता है।




चित्र साभार - गूगल

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

ज्योतिष


ज्योतिष वेदांग के छः भागों का एक अंग है । पहले महाऋर्षिगण नि:स्वार्थ रुप से लोगों की भलाई के लिए इस विद्या का उपयोग करते थे लेकिन आज ये केवल व्यवसाय का रुप बनती जा रही है ।मैं भी ज्योतिष की विद्यार्थी हूँ क्योकि यह विद्या अथाह सागर का भंडार है।मेरे अपने तर्क से कोई भी इस में परिपूर्ण नहीं है। जितनी बार इसे हम पढ्ते है नया से नया ज्ञान प्राप्त होता है। आज इस पर शोध करने की आवश्कता है ताकि लोगों मे पल रहे इस के प्रति अज्ञान व अंधविश्वास को दूर किया जा सके ।पहले के महाऋर्षियों के पास दिव्यदृ्ष्टि होती थी जो अपनी सूक्ष्म दृ्र्ष्टि द्धारा भूत, भविष्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया करते थे ।जातक की कुंडली को देखकर उस के भविष्य में घटित होने वाली शुभ अशुभ घटनाओं को देखा जा सकता है, न कि इसे टाला जा सके ।ज्योतिष के माघ्यम से हम उस के भविष्य की बुरी घट्ना को टालने की विधियां जरुर बता सकते है लेकिन उसे सम्पूर्ण रुप से नष्ट नहीं कर सकते है।प्रारब्ध कर्म तो उसे भोगना ही पड्ता है। हमारा जीवन जब दुखी होता है तो उसे सुखी बनाने के लिए ज्योतिषी के पास जाते है लेकिन ज्योतिषी कोई भगवान नहीं है ! ऎसा ही एक किस्सा सुनाती हूँ । एक महिला मेरे पास किसी की शादी के सिलासले मे आई । कहने लगी कि बहुत पंडितो को देखा दिया है सभी कहते है कि शादी का योग तो चल रहा है लेकिन फिर भी पता नही क्यों इसकी शादी नही हो रही है आप ऎसा कुछ उपाय बताएँ कि थोडे ही दिनों में इस की शादी हो जाएँ । मैने उस की कुंडली को देखा और कहा कि कल बताऊंगी क्योंकि मैं इतनी जल्दी इस का उत्तर नही देना चाहती थी । आखिर इतने पंडितों से पूछ कर जो मेरे पास आई थी! तो उस कुडंली का गंभीर विश्लेषण मेरे लिए जरुरी था । कल फिर वह महिला आई मैने उसे कहा कि अभी इसका विवाह का योग नही है । तीन साल के बाद विवाह होगा । अब वह कहने लगी कि कोई पूजा,दान,से बात नही बन सकती । अब हार कर मैने कुछ उपाय बता दिएं और कहा कि इन उपायों को वह कर लेती है तो उसके बाद जब लड्का देखने जाएं तो मुझे जरुर बता देना उस समय जो बताऊंगी फिर वह कर लेना ।प्रकृति के आगे इंसान का कोई बस नहीं चलता यही हुआ वह लडकी उन उपायो को नही कर पाई ।तीन चार महीने बाद उन उपायो को वह कर पाई । अब क्या था दो महीने के बाद उस ने बताया कि दो दिन बाद हम लडका देखने जा रहे क्या बात बन जाएंगी ? मैने कहा ठीक है जब लडका देख लोगे अगर पंसन्द आये तो मुझे फोन कर देना मै एक उपाय उसी समय करने को कहूंगी वह कर लिया तो रिश्ता पक्का समझना । अचानक मुझे पता चला कि गुरु जी ने दो दिन साधना की शिक्षा देनी है । मै चली गई । अब कक्षा में मोबाइल बंद रखना पडता है तो उसका मुझसे संपर्क न हो पाया । बाद मे पता चला कि उस ने हमे काफ़ी फोन किया था और उस ने बताया कि लड्का अच्छा था हमे पंसन्द था उन की तरफ से हां ही लग रही थी पर न जाने क्या हुआ कि उन का बाद मे फोन आया कि हमे ये रिश्ता नही करना ।वास्तव मे प्रकृति के आगे किसी का बस नही है । संचित और प्रारब्ध कर्मो का फल जातक को अपने इस जीवन में भोगना ही पड्ता है । थोडे बहुत उपायों द्धारा उसे हम कम कर सकते है लेकिन मिटाना किसी भी ज्योतिषी के हाथ में नही इसलिए मैंने पहले जो कहा कि इस पर शोध की आवश्यकता है उस के लिए निःस्वार्थ आगे आने की जरुरत है । वैसे तो संगीता जी, पंडित शर्मा जी का प्रयास भी प्रशंसनीय है । लेकिन औरो को भी आगे आना चाहिए ताकि इस शास्त्र की उन्नति हो सके और जो अपने स्वार्थ वश इस विद्या को कंलकित कर रहे है,उन से इसे बचाया जा सके। इस शास्त्र के गौरव की रक्षा के लिए अनुसन्धान कार्य में सरकार को भी मदद करनी चाहिए ।


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार

रविवार, 25 जुलाई 2010

गुरु पूर्णिमा की बहुत बहुत शुभकामनाएँ

 गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेवो महेश्वर:।'

गुरु साक्षात् परब्रह्म् तस्मै श्री गुरुवे नम:।।


गुरु पूर्णिमा का यह पर्व आषाढ मास की पूर्णमासी को मनाया जाता है।यह पर्व गुरु को अर्पित पर्व है। इस दिन अपने गुरुजी अथवा कुलगुरु की पूजा करनी चाहिए । श्रीकृ्ष्ण जी ने भी गुरु भक्ति के विषय में श्रीमदभागवत के एकाद्श स्कंध के अठारहवें अध्याय के 29 वें श्लोक में कहा है --


"तावत परिचरेद भक्तः श्रद्धावान न सूचक: ।


यावत ब्रह्म विजानीयान्ममेव गुरुमादृ्तः ।।"


अर्थात प्रभु कहते है -कि गुरु के प्रति पूर्ण सम्मान .द्दढ भक्ति और पूर्ण श्रृद्धा रखते हुए ब्रह्म प्राप्ति का पूर्ण मार्ग दर्शन प्राप्त होने तक गुरु के प्रति जरा भी शंका न करे ।न ही उन के किसी दोष के प्रति ध्यान दे।ब्रह्म प्राप्ति होने तक मुझे ही गुरु के रुप में देखे ।


गुरु रुहानी सृष्टि के बाद्शाह होते है। वह हम पर जो उपकार करते है । उस उपकार का मूल्य हम कभी नही चुका सकते है। वह ही हमारे सच्चे मित्र होते है।हमारी रक्षा हर मुश्किल में तथा लोक परलोक में भी संग होते है । अगर हम सदगुरु को परमात्म-स्वरुप समझकर प्रेम और श्रृद्धा से उनकी उपासना करते है तो शीघ्र ही जीवन की परम मंजिल को प्राप्त कर लेते है।वास्तव में पूर्ण सदगुरु मसीहा हैं जो धरा पर जन-कल्याण हेतु आते हैं ।परमात्मा से भी बडा सतगुरु का स्थान है तभी तो कबीर दास जी ने कहा है--कि


"गुरु गोंविन्द दोऊ खडे काके लागूँ पाँय ।


बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय ।"


अंत में श्री सदगुरु जी के श्री चरणों में कोटि- कोटि प्रणाम कर इतना ही कहूंगी कि सतगुरु ही दाता है, सच्चे नाम के इस जग में, तीनों लोको में नहीं ,सतगुरु सम कोई मीत ।


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार

सोमवार, 19 जुलाई 2010

अशुभ क्रकच योग

अशुभ क्रकच योग


 20 जुलाई 2010 मंगलवार ,दशमी तिथि को यह अशुभ क्रकच योग उत्पन्न हो रहा है । तिथि और वार के अंको का योग यदि 13 हो तो क्रकच नामक योग होता है । ऎसा योग मंगल कार्यो के लिए अमंगलकारी माना जाता है इसलिए ऎसे योग में शुभ कार्यो को नही करना चाहिए । ऎसे योग का  का वर्णन इस प्रकार से है :-

 वार रवि          सोम       मंगल      बुध         गुरु       शुक्र       शनि
अंक    1               2           3          4            5             6               7
तिथि द्धादशी    एकादशी   दशमी   नवमी      अष्टमी    सप्तमी      षष्ठी


 जैसे ---मंगलवार का अंक 3 और दशमी तिथि का 10 जो 10 +3=13 होता है ।

चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार


मंगलवार, 13 जुलाई 2010

रथ यात्रा

आज भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का पर्व है । भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा आषाढ शुक्ल पक्ष की दूज को मनाई जाती है।रथ यात्रा के इस पवन दिन श्री बलराम जी ,श्री कृष्णजी और देवी सुभद्रा जी का पूजन किया जाता है। श्री बलराम जी ,श्री कृष्णजी और देवी सुभद्रा जी की प्रतिमाएं को सुन्दर वस्त्रो,हार श्रृंगार और पुष्प मालाओ से सुसजित कर झांकी यात्रा निकाली जाती है।




हर साल रथो का निर्माण होता है । श्री जगन्नाथ जी का रथ जिसे नंदीघोष रथ कहा जाता है ।उन्हे लाल -पीले रंगो के कपडे से सजाया जाता है ।इस रथ में 16 पहिए लगे होते है । श्री बलभद्र जी का रथ जिसे तालध्वज रथ कहा जाता है इसे भी लाल-हरे रंगो के कपडे से सजाया जाता है।इस रथ की एक पहचान यह भी है कि इस रथ पर खजूर की पत्तियों का झंडा होता है।इस रथ में 14 पहिये होते है। दर्पदलम रथ जो देवी सुभद्रा जी का होता है।यह काले लाल कपडे से सजा होता है।जो शक्ति का प्रतीक होता है ।इस रथ में 12 पहिये लगे होते है । सोने के मूठ वाले चामर से सभी रथो पर बारी बारी चामर झला जाता है। भगवान जगन्नाथ इस दिन अपने बडे भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अलग अलग रथो मे बैठकर अपने जन्मस्थान गुण्डिचा मंदिर की ओर यात्रा करते है। इस दिन लोग व्रत भी रखते है ।ऎसा कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने वालो पर भगवान शेषनाग रक्षा करते है और उन्हे सब सुख-ऎश्वर्य प्रदान कर उन के सभी पापो का नाश करते है ।




भगवान जगन्नाथ जी का ये मंदिर 400 साल पुराना है । इस मंदिर के विषय मे यह कहा जाता है कि जिस शिल्पकार ने इन मूर्तियों का निर्माण किया था वह इन मूर्तियो के पैर तथा हाथ की कलाई नही बना पाया था और तभी आकाश वाणी हुई कि इन मूर्तियों को ऎसे ही स्थापित कर दिया जाएँ ।तब से ये मूर्तियाँ ऎसी ही स्थापित कर दी गई |


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार

सोमवार, 12 जुलाई 2010

नवरात्रे

सोमवार 12 जुलाई 2010 आषाढ शुक्लपक्ष प्रतिपदा तिथि, को माता का पहला नवरात्रा है। वैसे तो साल मे दो बार ही नवरात्र बनाया जाता है।एक चैत्र शुक्ल पक्ष के महीने मे और दूसरा आश्विन शुक्ल पक्ष के माह मे लेकिन दो बार ओर नवरात्रे आते है जिसे गुप्त नवरात्रा कहा जाता है ।वह गुप्त नवरात्रा एक तो आषाढ शुक्ल पक्ष मास मे और दूसरा गुप्त नवरात्रा माघ शुक्ल पक्ष के मास मे आता है। ये गुप्त नवरात्रे साधना सिद्धि के लिए होते है।तांत्रिक सिद्धि के लिए ये गुप्त नवरात्रे बहुत उपयुक्त होते है। गृहस्थ व्यक्ति को भी   इन दिनो मे माँ की पूजा आराधना कर और कुण्डलिनी शक्ति जागाकर क्रियाशील करनी चाहिए । ब्रह्मा,विष्णु,रुद्र,ईश्वर,सदाशिव और परशिव ये शिव कहलाते है । डाकिनी, राकिनी, लाकिनी, काकिनी, शाकिनी और हाकिनी ये छह शक्तियाँ है जो क्रमशःषटचक्र के अधिष्टातृ देवी-देवता है।साधना कर साधक शिव-शक्ति रुप मे परमात्मा का दर्शन पाते है। इन दिनो मे साधको के साधन का फल व्यर्थ नही जाता है ।माँ अपने भक्तो को उनकी साधना के अनुसार फल देती है। इन दिनो मे दान पुण्य का भी बहुत महत्व होता है।


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार



शनिवार, 12 जून 2010

शनैश्चरी अमावस्या


 आज 12-06-2010 ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष,रोहिणी नक्षत्र ,शनैश्चरी अमावस्या है।चंद्र का संचार मिथुन राशि पर है।आज ही शनि जयंती,भावुका अमावस्या और वट सावित्री व्रत भी है । इन सब के साथ-साथ आज सर्वार्थ सिद्ध योग भी है।इस शक्तिशाली योग मे प्रारम्भ किये अभीष्ट कार्यो में सफलता प्राप्त होती है। ये शनि जयंती चार साल के बाद आई है और अगला यह योग 2013 में बनेगा।इस दिन शनि देव की पूजा के साथ-साथ हनुमान जी की भी पूजा करनी चाहिए ।

सिंह , कन्या, तुला राशि पर अभी साढेसाती और मिथुन, कुंभ राशि पर शनि की ढैय्या चल रही है। ऎसे जातको को इस दिन शनि देव जी की प्रतिमा का पूजन कर तेल से अभिषेक करना चाहिए ।अगर कोई रोगी है तो उसे इस दिन तेल भरे बर्तन मे अपना मुंह देखकर पात्र सहित दान मे देना चाहिए ।जिन की कुंडली में 1,4,5,6, भाव मे अकेला अशुभ शनि बैठा हुआ है उसे यह उपाय जरुर करना चाहिए ।


जिन का लोहे, सरसो के तेल,कोयला,स्पिरिट ,लकडी अर्थात शनि के संबधित व्यवसाय हो उन्हे इस अदभुत संयोग से बने इस दिन मे शनि से संबधित वस्तुओ का दान और उनके मंत्रो का जाप जरुर करना चाहिए । शनि दान मे उडद की दाल ,तेल, लोहा ,चिमटा ,चमडा ,अंगीठी, पत्थर वाला कोयला, काले तिल ,का दान करना चाहिए ।इससे शनि-प्रकोप दूर होता है और शनि देव कृपा करते है। शनि कल्याण करते है तो जमाने भर की दौलत प्रदान करते है ।


संतान की प्राप्ति के लिए आज वट सावित्री व्रत का बहुत महत्व है। संतान प्राप्ति के इच्छुक वट वृक्ष का पूजन कर शाम को वट वृक्ष के नीचे सरसो या तिल के तेल का दीपक जरुर जलाएँ। इस व्रत को करने से सुख,सौभाग्य और संतान की प्राप्ति होती है। जिन की कुंडली में ग्रहो का अरिष्ट योग है,इस व्रत को करने से वह दोष दूर होता है।पुराणो के अनुसार इस वृक्ष मे सावित्री, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव का वास होता है इसलिए इस दिन औरते वृक्ष के चारो तरफ़ 108 या 7 बार प्रदक्षिणा कर सूत का धागा लपेट कर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण करती है। जिन कन्याओ के विवाह न हो रहा हो वह भी इस व्रत को करे तो उन के विवाह के योग बन जायेगे ।


शनि की शान्ति के लिए सुबह गंगाजल,काले तिल,दूध लेकर पीपल की जड मे डाले और शाम को इस वृक्ष के नीचे दीपक जलाये। शुक्रवार को काले चने भीगो दे ।अगले दिन शनिवार को उसे काले कपडे में रख कर साथ मे लोहे की हल्की पत्ती और कच्चा कोयला डाल कर उस कपडे को बाँधकर जहाँ मछलियाँ हो उस पानी में प्रवाहित करे।ऎसा माना जाता है कि यह दान मोती दान के बराबर होता है।







(अंजना )

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

पुरुषोत्तम मास

पुरुषोत्तम मास जिसे मल मास,लोंद का महीना और अधिक मास के नाम से भी जाना जाता है।अधिक मास 32 महीना 16 दिन और 4 घडी के अन्तर मे आया करता है।जो महीना सूर्य संक्रान्ति से रहित हो उसे मल-मास कहते है।जिस महीने मे अधिक मास आता है,उसमे चार पक्ष होते है।प्रथम और चतुर्थ पक्ष शुद्ध महीने के होते है तथा द्धितीय और तृतीय पक्ष अधिक मास कहलाते है यानि शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से शुरु होकर कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक अधिक मास होता है। अंग्रेजी वर्ष 2010 के तिथि अनुसार 15-04-2010 से 14-05-2010 तक वैशाख मास अधिक मास के रुप मे है।इस मास मे भगवान पुरुषोत्तम की नित्य पूजा की जाती है तथा उन की कथा सुनी जाती है।इस माह में एक काँसे की थाली में मिठाई तथा दक्षिणा रखकर कपडे में बाँध कर किसी ब्राह्मण को दान करना अच्छा होता है। वैसे भी इस मास व्रत , उपवास, दान ,पूजा आदि का बहुत महत्व माना जाता है।अगर सम्भव हो तो इस मास एक समय भोजन का नियम बनाकर व्रत करे । जो व्रत न कर सके वो भी अगर भगवान राधा-कृष्ण जी का पूजन करे ,अर्ध्य दे और प्रार्थना करे तथा नैवेद्य मे घी,गेहूँ के बने पदार्थ मालपूडा,फल,आदि का भोग लगाये तो उसे भी प्रभु की कृपा प्राप्त होती है क्योकि इस मास मे व्रत और दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, तथा व्रत करने वाले के अनिष्ट खत्म हो जाते है। अधिक मास मे कोई भी शुभ कार्य नही करना चाहिए जैसे विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन ,काम्य कर्म अर्थात फल प्राप्ति की कामना के लिए किए वाले काम नही करने चाहिए। हर साल 24 एकादशियाँआती जाने है लेकिन जिस वर्ष मल मास हो उस साल 26एकादशियाँ आती है ।मल मास की ये दो एकादशियो का बहुत महत्व है ,साथ ही अधिक मास की पूर्णिमा का भी बहुत महत्व है। जो इन व्रतो को करता है उसे प्रभु की कृपा प्राप्त होती है और प्रभु उसके सभी कष्टो को दूर कर देते है।



हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

रविवार, 21 मार्च 2010

मेरी कूची व कलम से




जन्म होने की खुशी
और मौत का रंज
ये तो दस्तूर है पुराना
मुक्त होगे कब हम
इन आदतो और इच्छाओ
से जकडे पिंजरो की जंजीरो से
आजादी की डोर है पास अपने
फिर भी बन अंजान यूही
कब तक ढोयेगे इन जंजीरो को
हुआ है मुश्किल हाय क्या करे !
निकलता है जब गम नया
सुख भी जाता है छिप
बादल की ओट मे ।

सोमवार, 15 मार्च 2010

महाकुम्भ पर्व का द्धितीय शाही स्नान



विक्रम संवत् 2066 ,चैत्र मास कृष्ण पक्ष अमावस्या सोमवार दिनांक 15 मार्च 2010 को आज हरिद्धार मे महाकुम्भ पर्व का द्धितीय शाही स्नान है। आज सोमवती अमावस्या भी है ।आज सूर्य और चंद्र का अद्भूत् संयोग है ।सोमवती अमावस्या और महाकुम्भ का यह अद्भूत् संयोग 760 वर्ष के बाद हुआ है।पवित्र नदियो मे स्नान करना पुण्यदायक माना जाता है लेकिन यही स्नान जब विशेष पर्वो पर हो तो इस का महत्व कई गुना अधिक हो जाता है। हमारे शास्त्रो मे कुम्भ के इस महापर्व मे स्नान का बहुत महत्व बताया है। हजारो स्नान कार्तिक मास मे ,सैकडो स्नान माघ मे और वैशाख मास मे करोडो बार नर्मदा नदी मे स्नान किये हो ,इन सभी के स्नान का फल एक बार कुम्भ मे स्नान करने से मिल जाता है। हजारो अश्वमेघ यज्ञ,सैकडो वाजपेय यज्ञ करने तथा लाखो प्रदक्षिणा पृथ्वी की करने पर जो फल मिलता है वही फल कुम्भ पर्व मे स्नान से मिलता है। स्नान करते समय अपने दोनो हाथो द्धारा कुम्भ- मुद्रा (कलश मुद्रा ) दिखाकर और उसमे अमृत की भावना कर स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद गणपति जी का पूजन करने से पहले कलश की स्थापना करनी चाहिए ।फिर कलश का षोडशोपचार पूर्वक एक, चार, ग्यारह, इक्कीस अथवा यथा शाक्ति सुवर्ण, रजत, ताम्र, या पीतल के कलशों में धृत भर कर योग्य विद्धान को ' घृत कुम्भ ' का दान करना चाहिए। वैसे भी कुम्भ पर्व के समय घृतपूर्ण कुम्भ (कलश) का पूजन कर वस्त्र,अंलकार,आभूषण तथा सुवर्ण खण्ड सहित सदाचारी विद्धान को देने से सैकडो गोदान ,तीर्थ यात्रा और अश्वमेघ यज्ञ करने का फल मिलता है तथा मनुष्य के पितरो की आत्मा संतुष्ट होती है।

चित्र गूगल से



मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

108 की संख्या





108 की संख्या का ऎसा क्या रहस्य है कि ये संख्या पवित्र और शुद्ध मानी जाती है। मंत्र जाप मे भी 108 की संख्या का मह्त्व है क्योकि 108 दानो की माला चाहे वो रुद्राक्ष हो या तुलसी की माला हो ,सर्व सिद्धिदायक मानी गयी है। 108 की संख्या का हमारे मंत्र जाप से क्या संबध है ? इस गूढ रहस्य का भेदन कर जो परिणाम सामने आता है।उसके लिए हमे अपने प्राचीन ऋषियो के चिन्तन और अगाध ज्ञान पर श्रद्धा से नतमस्तक होना पडता है। मोक्ष प्राप्त करना मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य है और इसे प्राप्त करने के लिए योगी जन शरीर के अन्दर स्थित सात चक्रो के भेदन करते है। इसे कुण्डली जागरण कहते है। मूलाधार चक्र पहला चक्र है और सहस्त्रधार चक्र सातवां आखिरी चक्र है|
अंक ज्योतिष के आधार पर 1 का अंक सूर्य का है। जो कि मूलाधार चक्र से संबन्धित है। एक अंक जो ब्रह्म का बोधक है,जब वह अद्वैत रुप से रहता है।
अंक 0 शब्द के मूल आकाश को शून्य कहते है और अंक के मूल को भी शून्य ,शून्य से ही शब्द और अंक की उत्पति होती है।यह पूर्णता का प्रतीक है।
अंक 8 जो शनि का है । जो सहस्त्रधार चक्र से सबंन्धित है।जिसका स्थान सिर के ऊपर होता है।यह सातवां आखिरी चक्र है। जो माया का प्रतीक है।जिस प्रकार से आठ का पहाडे को गुणा करने पर गुणनफल जोडने पर योग घटता-बढता रहता है।यानि ---
8x1=8
8x2=16=1+6=7
8x3=24=2+4=6
8x4=32=3+2=5
8x5=40=4+0=4
8x6=48=4+8=12=1+2=3
8x7=56=5+6=11=1+1=2
8x8=64=6+4=10=1+0=1
8x9=72=7+2=9
8x10=80=8+0=8

इसी प्रकार माया का भी यही हाल है जो निरंतर घटती बढती रहती है ,लेकिन जब ब्रह्म रुपी एक अंक और पूर्णता रुपी शून्य अंक आता है तो माया तितर-बितर हो जाती है। इसीलिए 108 की संख्या सर्वसिद्धि दायक मानी जाती है। इस संख्या का जितना महत्व है, उतना ही इस संख्या मे छुपा रहस्य भी महत्वपूर्ण है।


रविवार, 17 जनवरी 2010

खंडित आत्मा


पिछले लेख मे मैने आत्मा के दो खंडो के बारे मे चर्चा की थी ।जिसमे एक खंड स्त्री तत्व और दूसरा पुरुष तत्व है।वास्तव मे आत्मा के भी वर्ग है ।उच्च, मध्यम और निम्न । जब कालचक्र मे घूमती हुई एक ही वर्ग की आत्माएँ आपस मे मिलती है,तो उन्हे पूर्ण संतुष्टि मिलती है।कभी कभी आप ने महसुस किया होगा कि हमारा मन बहुत व्याकुल हो जाता है लेकिन हम उस का कारण नही समझ पाते । यह बैचनी क्यो है? यह व्याकुलता क्यो है?माया के कारण हम यह जान नही पाते । जो इस माया के भ्रम जाल से निकल पाता है वह ही इस रह्स्यमय और गोपनीय भेद को जान पाता है।हम ने न जाने कितनी बार जन्म लिया ,कभी स्त्री बने ,कभी पुरुष बने ।इस तरह के न जाने कितने ही विवाह किये ,पर हमे शान्ति नही मिली ।वास्तव मे हमारा मिलन शारीरिक तल तक ही सीमित था। जो काम और भौतिक कामनाओ के अतिरिक्त और कोई सृ्ष्टि पैदा नही करता है ।आत्मा के मिलन का हम ने कभी प्रयास ही नही किया अर्थात बिछुडे हुये आत्मखंड के मिलन का प्रयास ही नही किया। बिछुडे हुये आत्मखंड का मिलन जब होता है तभी सच्चे अर्थो मे वास्तविक मिलन कहा जाता है । तभी हमारी खंडित आत्मा को आन्नद प्राप्त होता है ।यही आत्मा की पूर्णावस्था है तथा मुक्ति है।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

सूर्यग्रहण


आज मौनी अमावस्या है और साथ मे महाकुम्भ का अवसर भी है,तथा सूर्य ग्रहण भी है । आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है।सच पूछा जाए तो आज के दिन इंसान् अगर अपने आप को पहचानने की कोशिश करे तो वह इसमे कायम हो सकता है ।जीवन और मृ्त्यु के चक्र मे आत्मा कब आ फंसती है,आत्मा की पूर्णा अवस्था क्या है ।ऎसे ही अनेको प्रश्न हर इंसान के दिमाग मे होते है।जिसे वह जानना चाहता है।आज के शुभ दिन द्धारा हम इसे जान सकते है यानि प्रभु की उपासना से । हमारी आत्मा अपने आप मे पूर्ण नही है, खंडित है,अपने आप मे टूटी हुई है।माया के कारण हम यह जान नही पाते है।वास्तव मे आत्मा दो खंडो मे विभाजित है।एक खंड स्त्री तत्व और दूसरा पुरुष तत्व है।प्रकृ्ति के इस वातावरण मे ये दोनो खंड अलग अलग हो गये है।हमे आत्मा के दूसरे खंड को जानने की कोशिश करनी चाहिए ।इस के लिए आज का दिन बहुत उत्तम है। सूर्यग्रहण के दौरान अपनी आंतिरक ऊर्जा का विकास करे ।समय की कमी के कारण बाकि चर्चा फिर करुंगी ।

शनिवार, 9 जनवरी 2010

हिन्दी भाषा


अँग्रेजी भाषा का प्रचलन दिनो दिनो बढता जा रहा है।वर्तमान समय में हिन्दी भाषा के प्रति देश में कम हो रहे रूझान से देश की संस्कृतिक विरासत पर नकारात्मक प्रभाव पड रहा है ।जिससे मन बहुत दुखता है। अँग्रेजी भाषा से इतने मोहित होते जा रहे है कि हिन्दी भाषा उपेक्षित होती जा रही है।आज हिन्दी -पत्रिका हो या समाचार पत्र उसे पढ़ना फैशन के विरुद्ध मानते है।हमारे देशवासी अंग्रेजी सभ्यता,साहित्य और रिवाजो पर इतना मोहित हो गये है कि आज वो पिता को डैड कहने लग गया है।डैड जिसका अर्थ है मरा हुआ व्यक्ति,जो पिता हमारे लिए पूजनीय है। आज उन्हे सम्मानजनक शब्दो मे कहने मे भी तकलीफ होती है।माता जो मम्मी बन गई है यानि मसाला लगाकर सुरक्षित रखा गया मृ्तक शरीर । शब्दो का प्रभाव तो हमारे आंतरिक सोच पर भी पड़ता है तभी तो आज माता-पिता , मम्मी डैड बनकर रह गये है यानि बच्चो को अपने माता-पिता से स्नेह लगाव सब मर कर रह गया है,एक मृ्तक शरीर की तरह !!भाषा हमारी संस्कृति का आईना है और इस प्रकार हिन्दी भाषा से दूरी हमें हमारी संस्कृति से भी दूर करेगी।भाषा के विकास एंव उत्थान के लिए हिन्दी भाषी समाज को अंग्रेजी मानसिकता छोडकर आगे आना होगा।जब तक सब मिलकर एकजुट होकर हिन्दी को सर्वोपरि समझकर नहीं बोलते तब तक हम हिन्दी भाषी एकजुट नहीं हो सकते है इसलिए आवश्यक है कि हम अपने जीवन में हिन्दी भाषा को विशेष स्थान दें।

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

प्यार की मंजिल


ये बात कालेज की दिनो की है।तब मै खूब कविताये लिखा करती थी । तब की लिखी अनेक कविताएं मेरी डायरी के पन्नो मे बंद पडी है, पर कालेज के समय हमारी एक सखी ने एक कविता ले कर स्वतंत्र दर्पण (पाक्षिक) मे छापा डाली, हमे मालूम न था ।जब पत्रिका डाक के जरिऎ हमारे घर आई तब हैरान हो गये कि ये कहां से आ गई पत्रिका ? पर जब उसे देखा तो उसमे अपनी छपी कविता को देख कर बहुत खुशी हुई । वह कविता आप भी पढिये ………...

ये प्यार की मंजिल है कठिन ,
कुछ फूल कुछ कांटे है इसमे,
जरा संभल कर चल तू,
कही चुभ न जाए कांटा,
जरा देखकर चल तू ।


ये प्यार की मंजिल है कठिन,
कुछ हरियाली कुछ पतझड है इसमे,
जरा संभल कर चल तू,
कही हाथ न आए पतझड ,
जरा देख कर चल तू ।।

ये प्यार की मंजिल है कठिन ,
पर मुश्किल तो नहीं,
फूल हो या कांटा डगर पर ,
छाई हो बहार या पतझड मौसम पर ,
जरा पहचान कर चल इस मंजिल पर ।।।

अंजना      

चित्र साभार - गूगल


शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

जाने पुनर्जन्म के बारे मे


भगवत् गीता में भी लिखा है कि जिस तरह से एक मनुष्य पुराने कपड़े उतार कर नए कपड़े पहनता है उसी तरह हमारी आत्मा भी पुराने शरीर को छोड़ कर नया शरीर धारण करती है लेकिन ये नया शरीर क्या हमे मानव का ही मिलता है या पशु का ।इस मे भी सभी के अलग अलग विचार है ।कोई कहता है कि बुरा कर्म करने वालो को अगले जन्म मे पशु की योनि मिलती है,लेकिन वास्तविकता यह है कि मनुष्य के आत्म संस्कारो,उसकी वासनाओ के परिणामो के अनुसार ही उस का अगला जन्म निर्धारित होता है,लेकिन योनि मानव की ही रहती है । पशु जैसा शरीर नही मिलता बल्कि पशु जैसा मन मिलता है यानि उसकी बुद्धि, वृत्ति,प्रवृ्त्ति, कृ्त्ति सब पशुओ जैसी हो सकती है । इस तरह उस के कर्मो और संस्कारों के परिणाम के अनुसार उसका भाग्य , प्रारब्ध और स्वभाव बदल जाता है पर योनि नही बदलती है ।मानव शरीर लेकर भी उसका जन्म गधे जैसा हो सकता है इसलिए हम इस डर को कि हम पशु-पक्षी की योनि में जन्म लेगे इसे अपने मन से निकाल दे और अशुभ कर्मो का त्याग कर मुक्ति की राह को जाएं |

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