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मंगलवार, 13 जुलाई 2010

रथ यात्रा

आज भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का पर्व है । भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा आषाढ शुक्ल पक्ष की दूज को मनाई जाती है।रथ यात्रा के इस पवन दिन श्री बलराम जी ,श्री कृष्णजी और देवी सुभद्रा जी का पूजन किया जाता है। श्री बलराम जी ,श्री कृष्णजी और देवी सुभद्रा जी की प्रतिमाएं को सुन्दर वस्त्रो,हार श्रृंगार और पुष्प मालाओ से सुसजित कर झांकी यात्रा निकाली जाती है।




हर साल रथो का निर्माण होता है । श्री जगन्नाथ जी का रथ जिसे नंदीघोष रथ कहा जाता है ।उन्हे लाल -पीले रंगो के कपडे से सजाया जाता है ।इस रथ में 16 पहिए लगे होते है । श्री बलभद्र जी का रथ जिसे तालध्वज रथ कहा जाता है इसे भी लाल-हरे रंगो के कपडे से सजाया जाता है।इस रथ की एक पहचान यह भी है कि इस रथ पर खजूर की पत्तियों का झंडा होता है।इस रथ में 14 पहिये होते है। दर्पदलम रथ जो देवी सुभद्रा जी का होता है।यह काले लाल कपडे से सजा होता है।जो शक्ति का प्रतीक होता है ।इस रथ में 12 पहिये लगे होते है । सोने के मूठ वाले चामर से सभी रथो पर बारी बारी चामर झला जाता है। भगवान जगन्नाथ इस दिन अपने बडे भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अलग अलग रथो मे बैठकर अपने जन्मस्थान गुण्डिचा मंदिर की ओर यात्रा करते है। इस दिन लोग व्रत भी रखते है ।ऎसा कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने वालो पर भगवान शेषनाग रक्षा करते है और उन्हे सब सुख-ऎश्वर्य प्रदान कर उन के सभी पापो का नाश करते है ।




भगवान जगन्नाथ जी का ये मंदिर 400 साल पुराना है । इस मंदिर के विषय मे यह कहा जाता है कि जिस शिल्पकार ने इन मूर्तियों का निर्माण किया था वह इन मूर्तियो के पैर तथा हाथ की कलाई नही बना पाया था और तभी आकाश वाणी हुई कि इन मूर्तियों को ऎसे ही स्थापित कर दिया जाएँ ।तब से ये मूर्तियाँ ऎसी ही स्थापित कर दी गई |


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार

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