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रविवार, 19 जुलाई 2009

रुद्राक्ष भाग-1

रुद्राक्ष

रुद्राक्ष धारण करने का प्रचलन काफी बढ़ता जा रहा हैलिंगपुराण, मत्स्यपुराण, स्कंदपुराण, शिवमहापुराण, पदमपुराण, एवम उपनिषदो मे तन्त्र मन्त्र आदि ग्रन्थो मे रुद्राक्ष के गुणो का वर्णन मिलता है।
रुद्र का अर्थ है शिव और अक्ष का अर्थ है आँख।दोनो को मिलाकर रुद्राक्ष बना।ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आँखों के जलबिंदु से हुई है।भगवान शिव के आँखों से जो जल इस धरती पर पडा उस जल से इस धरती पर रुद्राक्ष के वृ्क्ष उत्पन्न हो गये।रुद्राक्ष की उत्पत्ति के संबंध में कई तरह की पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, शिव ने सैकडों वर्ष तक साधना की। साधना पूरी होने के बाद जब उन्होंने अपनी आंखें खोलीं, तो उनसे आंसुओं की धारा निकल पडी। ये दिव्य अश्रु-बूंद जहां-जहां भी गिरे, उनसे अंकुरण फूट पडा! बाद में यही रुद्राक्ष के वृक्ष बन गए। रुद्राक्ष के संबंध में एक और कथा प्रचलित है। इसके अनुसार, एक बार दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया। हवन करते समय उन्होंने शिव का अपमान कर दिया। इस पर क्रोधित होकर शिव की पत्नी सती ने खुद को अग्निकुंड में समाहित करलिया। सती का जला शरीर देख कर शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने सती का पार्थिव शरीर अपने कंधे पर टांग लिया और पूरे ब्रह्मांड को भस्म कर देने के उद्देश्य से तांडव नृत्य करने लगे। सती का जला शरीर धीरे-धीरे पूरे ब्रह्मांड में बिखर गया। अंत में सिर्फ उनके देह का भस्म ही शिव के शरीर पर रह गया, जिसे देख कर वे फूट-फूट कर रो पडे। कहते हैं, उस समय जो आंसू उनकी आंखों से गिरे, वही पृथ्वी पर रुद्राक्ष के वृक्ष बने। ये रुद्राक्ष न केवल कई रोगों से हमारा बचाव करते हैं, बल्कि मन को शांति प्रदान करने में भी सहायकहोतेहैं। रुद्राक्ष का आकार एक बेर के आकार का होता है।लेकिन मलेशिया का रुद्राक्ष मटर के दाने के आकार का होता है, रुद्राक्ष तीन रगो मे पाया जाता है-लाल,काला,और मिश्रित्।असली रुद्राक्ष की पहचान यही है कि यह जल मे डूब जाता है,लेकिन नकली रुद्राक्ष जल मे तैरता रहता है।इस मे बनने वाली धारियो को ही मुख कहा जाता है।
रुद्राक्ष के मुख
रुद्राक्ष् के एक मुख से लेकर इक्कीस् मुख तक होते है।भिन्न भिन्न मुखो वाले रुद्राक्ष मे अलग-अलग प्रकार की शाक्ति होती है।इस के अलावा गौरी--शंकर रुद्राक्ष, गणेश रुद्राक्ष,सवार रुद्राक्ष,और त्रिजुती रुद्राक्ष भी है।जिनकी अपनी अलग महत्ता है।


1.एकमुखी रुद्राक्ष- स्वयं शिव का स्वरूप है जो सभी प्रकार के सुख, मोक्ष और उन्नति प्रदान करता है।इसके स्वामी ग्रह सूर्य है।इसलिए इसको धारण करने से सूर्य ग्रह से सम्बाधित सभी दोष नष्ट हो जाते है।यह आंख, नाक, कान और गले की बीमारियों को दूर करने में सहायक होता है।इस को धारण करने वाला ब्रह्म-हत्या जैसे महापापो से भी मुक्त हो जाता है।


2.द्विमुखी रुद्राक्ष-अर्धनारीश्वर रुप होने की वजह से एकता का प्रतीक माना जाता है।इसको धारण करने से आदशाक्ति भगवती की कृ्पा प्राप्त होती है।इसके स्वामी ग्रह चन्द्र है।जिन लोगो को बहुत गुस्सा आता है,उनको इसे धारण करना चाहिए।सभी प्रकार की कामनाओं को पूरा करने वाला तथा दांपत्य जीवन में सुख, शांति व तेज प्रदान करता है।यह धैर्य और सामाजिक प्रतिष्ठा की वृद्धि में सहायक होता है।इसे धारण करने से गौ-हत्या जैसे पाप भी दूर हो जाते है।साथ ही पाचन तंत्र संबंधी समस्याएं भी काफी हद तक दूर हो जाती हैं।


3.त्रिमुखी रुद्राक्ष- यह साक्षात तीन अग्नियो (गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि) का स्वरुप होता है।जो इसे धारण करता है,उस पर अग्नि देव प्रसन्न होते है।इस के स्वामी ग्रह मंगल है। यह स्त्री-हत्या जैसे पापो को दूर करने वाला, विधा प्रदाता,शुत्र नाश,पेट की व्याधि तथा अपघात जैसी अशुभ घटनाओ से रक्षा करता है।मधुमेह,रक्तचाप मे भी लाभकारी होता है।जो ज्वर तीन दिन पीछे आता हो इस के धारण करने से नही रहता है।यह रुद्राक्ष ऐश्वर्य प्रदान करने वाला होता है। (क्रमशः)


चित्र साभार - गूगल

8 टिप्‍पणियां:

  1. रूद्राक्ष के बारे में आपने काफी ज्ञानवर्द्धख आलेख लिखा है.. जानकारी में बढ़ोतरी हुई.

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  2. आजकल नकली एकमुखी रुद्राक्ष की भरमार है . क्या इंडोनेशिया का रुद्राक्ष वाकई रुद्राक्ष है ?

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  3. बहुत खूब अंजना जी ,
    बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने रुद्राक्ष के बारे में .हिंदी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत ..साथ ही ब्लॉग की सफलता के लिए शुभ कामनाएं .
    हेमंत कुमार

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  4. Rudraksh ke bare mein padhkar achha laga per mujhe lagta hai is per kuchh jankriya rdraskh ek pare mein sahi nahi hai as Asali rukrash pani mein tairta nahi doob jata hai.

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  5. सी.अल सैनी जी त्रुटि ठीक कर दी है । आप का बहुत बहुत आभार।आप का मेरे ब्लाग पर आने का बहुत बहुत धन्यवाद ।

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