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बुधवार, 9 नवंबर 2011

पंचक


आज की पोस्ट पंचक के ऊपर है।पंचक अर्थात पाँच नक्षत्र-धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और
रेवती। इसमें जन्म और मृ्त्यु दोनो को अशुभ माना जाता है। अतः पंचक की शान्ति अवश्य करानी चाहिये।धनिष्ठा ,उत्तराभाद्रपद, शतभिषा, यें तीन नक्षत्र तमोगुणी नक्षत्र कहलाते है।पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र सतोगुणी तथा रेवती रजोगुणी नक्षत्र में आता है। धनिष्ठा नक्षत्र के देवता वसु तथा स्वामी मंगल है।शतभिषा नक्षत्र के देवता वरुण तथा स्वामी राहू है।पूर्वाभाद्रपाद जिसके देवता अहि तथा स्वामी गुरु है।उत्तराभाद्रपाद नक्षत्र के देवता नाग तथा स्वामी शनि है।रेवती नक्षत्र के देवता पितर तथा बुध है।पंचक में पाँच कर्म नही करने चाहिए।--
  1. तृ्ण और काष्ठ संग्रह करना ।
  2. मकान की छत डालना ।
  3. दक्षिण दिशा की यात्रा ।
  4. खटिया अथवा पंलग बनाना या बुनना ।
  5. प्रेतदाह
              इन सभी में प्रथम चार कार्य को तो रोका जा सकता है लेकिन प्रेतदाह अर्थात शव का दाह-संस्कार इसको टाला नही जा सकता है इसलिए अगर पंचक में किसी की मृ्त्यु हो जाएँ तो उसके परिहार के लिए शव के साथ पाँच पुतले बनाकर जलाये जाते है।जिससे इस अशुभ स्थिति को टाला जा सके ।कुशा के पाँच पुतले बना कर उनपर मौली लपेटकर उसे शव के साथ अर्थी पर रखकर तिल,शहद से पूजन कर पहला पुतला शव के सिर पर,दूसरा नेत्रो पर ,तीसरा दाई कूख पर,चौथा नाभी पर ,पाँचवा पैरो पर रखा जाता है।फिर इन नक्षत्र देवताओ की मंत्र द्धारा आहुति दी जाती है।
                  पंचक मे मृ्त्यु को अशुभ माना जाता है उसका तो परिहार कर दिया जाता है लेकिन पंचक मे जिस बालक का जन्म हो उसकी शान्ति भी जरुर करवानी चाहिए । जिस तरह गंड्मूल की पूजा में 27 वस्तुओ की जरुरत होती है ।उसी तरह पंचक शान्ति में सात वस्तुओ का महत्व होता है। सूतकोपरांत सात वृ्क्षों के पत्ते, सात धान्य, सात तिलहन से सब गर्म पानी में उबालकर उस पानी से बालक को स्नान करवाये । उबालने के लिए नया मिट्टी का बर्तन लें । घडे में सात छिद्र करे तथा छलनी में घास डालकर घडे के नीचे रखकर स्नान कराये ।यदि जन्म दिन का है तो पिता पानी डाले, अगर रात का जन्म है तो माता पानी डाले ।यदि सध्याकाल का जन्म है तो  दोनो पानी डाले। 
 कहा जाता है कि धनिष्ठा नक्षत्र में छत को डालना,दक्षिण दिशा की यात्रा,और चारपाई बनाना निषेध माना गया है क्योकि इसमे अग्नि भय होता है।शतभिषा नक्षत्र में कलह,पूर्वाभाद्रपाद में करने से रोग, उत्तराभाद्रपाद में करने से जुर्माना, रेवती नक्षत्र मे करने से धन की हानि होती है। 




चित्र गुगल साभार 

9 टिप्‍पणियां:

  1. धन्यवाद..... शास्त्री जी .

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  2. धार्मिक अनुष्ठानो, रीति रिवाजों को जानने की दृष्टी से आपका ब्लॉग उपयोगी है लेकिन ब्लॉग का नाम अच्छा नहीं लगा। सोचकर अच्छा नाम हिंदी में लिखें तो बेहतर है। अनुवाद भी सही है..शक्ति।

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  3. धन्यवाद...देवेन्द्र जी, आप को मेरा ब्लाँग अच्छा लगा |ये जान कर खुशी हुई लेकिन जो नाम बदलने की बात है|उस के लिए तो आप से माफ़ी चाहती हूँ क्योँकि इस नाम से जुड़ी मेरी अपनी भावनाएँ भी अह्म है|परन्तु भविष्य में आप की बात पर गौर करुँगी |आभार...

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  4. बहुत बढ़िया लिखा है आपने ! शानदार प्रस्तुती!

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  5. आपकी भावनाएं सिर माथे पर।...सहमत।

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  6. आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए धन्यवाद!

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