रविवार, 21 मार्च 2010

मेरी कूची व कलम से




जन्म होने की खुशी
और मौत का रंज
ये तो दस्तूर है पुराना
मुक्त होगे कब हम
इन आदतो और इच्छाओ
से जकडे पिंजरो की जंजीरो से
आजादी की डोर है पास अपने
फिर भी बन अंजान यूही
कब तक ढोयेगे इन जंजीरो को
हुआ है मुश्किल हाय क्या करे !
निकलता है जब गम नया
सुख भी जाता है छिप
बादल की ओट मे ।

16 टिप्पणियाँ:

  1. सादर वन्दे!
    इस सुन्दर अभिवयक्ति पर अर्ज किया है,

    आदमी से आदमी का रिश्ता अब यूँ हुआ,
    मै ढूढता रहा लोग भूलते गए.
    रत्नेश त्रिपाठी

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  2. निकलता है जब ग़म नया
    सुख भी जाता है छिप
    बादलों की ओट में

    ये भी तो दस्तूर पुराना ही है
    जिंदगी धूप-छाँव का ही खेल है
    और हम....
    इच्छाओं और आदतों में जकड़े रहना ही
    पसंद करते हैं ....शायद

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  3. मुक्त होगे कब हम
    इन आदतो और इच्छाओ
    से जकडे पिंजरो की जंजीरो से

    शायद अगली पीढ़ी कुछ मुक्त हो जाये हमारी गुहार से .....!!

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  4. इच्छाओ
    से जकडे पिंजरो की जंजीरो से
    आजादी की डोर है पास अपने
    फिर भी बन अंजान यूही
    कब तक ढोयेगे इन जंजीरो को
    हुआ है मुश्किल हाय क्या करे !
    vah bahut hee sundar aur samvedansheel panktiyan.

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  5. बहुत सुन्दर रचना । आभार
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  6. जन्म होने की खुशी ऒर मॊत का रंज ये तो द्स्तूर हॆ..सही कहा
    चित्र वाकई अच्छा हॆ...

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  7. waqai me bahut hi sahi baat likhi hai aapane .
    rachana ki har pankti haqikat liye huye hai.
    poonam

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  8. SACH ME IS JANM MRITYU KE KHEL KO KAUN SAMAJH PAYA HAI!1ACHHA LGA AAPKA BLOG!!!

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  9. बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

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  10. जीवन के सत्य को बताती अच्छी रचना...बधाई

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  11. बहुत ही मारक है आपकी रचना ।

    आभार..!

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  12. रचना सुन्दर है, पर एक बात कहना चाहूँगा कि, किसने पाई है जीवन चक्र से निजात ? भगवान् भी जब मनुष्य का रूप धर जन्म लेते हैं तो उन्हें भी इनसारी बातों से होकर गुज़रना पढता है !

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  13. बेनामीJun 9, 2010 06:46 AM

    kafi achi kavita likhi hai apne apki aur kavitao ka intezar rahega......

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