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मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

विक्रम संवत 2078

 हिंदू नव वर्ष का आरंभ चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से किया जाता है।चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था।आज नवसंवत्सर विक्रम संवत 2078 मार्च 13, 2021 से हिंदुओं का नया साल शुरू होता है। हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य को आरम्भ करते समय उस समय के नवसंवत्सर का उच्चारण किया जाता है। कुल संवत्सर 60 प्रकार के होते हैं। जब 60 संवत्सर पूरे हो जाते हैं तो फिर पहले संवत्सर का आरंभ हो जाता है। हमारे ग्रंथों में भी 60 साल के चक्रों का वर्णन है। जिसे 3 भागो में बांटा गया है। 20 साल ब्रह्मा जी के, 20 साल विष्णु जी के, 20 साल शिव जी के माने गये हैं। ब्रह्माजी के 20 साल नवनिर्माण के होते हैं जिसमें निर्माण और विनाश दोनों होते हैं। 20 साल जो विष्णुजी के है, उसमे नये आविष्कार दुनिया में होते हैं। जो ब्रह्माजी के निर्माण का ही एक अंग है। बाकि जो 20 साल शिवजी के होते हैं वो उन सबको भोगने के लिए होते हैं।

विक्रम संवत 2078 का आरंभ मंगलवार से हो रहा है तो इस साल के राजा मंगलदेव और मेष संक्राति भी है तो मंत्री भी मंगलदेव होगे। नवरात्रि का पहला दिन जो वार होता है उससे माँ दुर्गा के वाहन का पता चलता है। मंगलवार के दिन होने पर देवी  का वाहन घोड़ा है इसलिए इस बार माँ दुर्गा घोड़े पर सवार होकर धरती पर आई है। जिस से युद्ध की आशंका रहती है। पर जाते समय उनका वाहन हाथी है।  जो खेती के लिए शुभ है तथा साथ ही ज्यादा वर्षा के योग भी बनते हैं।

चित्र---गूगल साभार 

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

कामाख्या शक्तिपीठ

 


कामाख्या शक्तिपीठ असम राज्य के गुवाहाटी के पश्चिम में 8 किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित है। कामाख्या मंदिर जो 51 महाशक्ति पीठो मे से एक है। यहां सती माता का योनि अंग गिरा था इसलिए इसे योनिपीठ भी कहा जाता है। कामाख्या मंदिर में प्रवेश करते ही एक बहुत बड़ा हॉल है।उस हॉल के बीच में हरगौरी के रुप में कामेश्वर शिव-कामेश्वरी देवी की युगल मूर्ति स्थापित है। सीढ़ियां उतर कर गर्भगृह है। कामाख्या योनि पीठ से निरंतर जल बहता रहता है। यह जल कहाँ से आता है और कहाँ जाता है, यह एक रहस्य है।
 

गर्भगृह में देवी माता की योनि रूपा शिला विद्यमान है, जो वस्त्र से ढकी रहती है और उस के सामने दीपक जलता रहता है। शक्ति पीठ की रक्षा के लिए उन से संबंधित एक भैरव होते हैं। भैरव को शिव का ही रूप माना जाता है। भैरव जो पीठ की रक्षा करते हैं उन्हें क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। कामाख्या मंदिर के भैरवजी उमानन्द जी है। इन के दर्शन करने पर ही कामाख्या मंदिर की यात्रा पूरी मानी जाती है। कामाख्या देवी के मंदिर के निकट एक कुंड है।जिसे सौभाग्य कुण्ड कहा जाता है। कुंड का पानी लाल रंग का है। कुंड के पास ही गणेश जी का मंदिर है। इन का दर्शन करना भी जरूरी होता है।जब आषाढ़ मास में सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है तो उस समय पृथ्वी ऋतुमति होती है।इस समय को अम्बुवाची पर्व कहते है। यहां हर साल इस समय अम्बुवाची मेला लगता है। उस दौरान पास में स्थित ब्रह्मपुत्र का पानी तीन दिन के लिए लाल हो जाता है। कामाख्या देवी के मासिक धर्म के कारण पानी का रंग लाल हो जाता है।माना जाता है कि जब मां तीन दिन की रजस्वला होती है तो सफेद रंग का कपडा मंदिर के अंदर बिछा दिया जाता है। चौथे दिन ब्रह्म मुहूर्त में देवी को स्नान करवाकर श्रृंगार के उपरान्त ही मंदिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है। तीन या चार दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं, तब वह वस्त्र माता के रज से लाल रंग से भीगा होता है। इस भीगे कपड़ें को अम्बुवाची वस्त्र कहते है। इसे ही भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है
 

तंत्र साधना के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण जगह मानी जाती है।ऐसा माना जाता है कि उच्च कोटि के तंत्र साधक इस अवसर पर सूक्ष्म शरीर द्वारा माता के दर्शनों के लिए आते हैं। कामाख्या में अम्बुवाची पर्व के अलावा दो उत्सव और मनाए जाते हैं।पहला देवध्वनि उत्सव, इसमें वाद्ययंत्रों के साथ नृत्य किया जाता है और दूसरा हर-गौरी विवाह। पौष माह के कृष्ण पक्ष में पुष्य नक्षत्र में यह उत्सव मनाया जाता है, जिसमें कामेश्वर की चल मूर्ति को कामेश्वर मंदिर में प्रतिष्ठित  किया जाता है। दूसरे दिन देवी के मंदिर में दोनों मूर्तियों का हर-गौरी विवाह का उत्सव मनाया जाता है। 


चित्र... गूगल साभार 

रविवार, 18 अक्तूबर 2020

असली रहस्य जन्म मरण का..

मानव बार- बार जन्म लेता है पर इस आवागमन से छुटकारा नहीं मिल पाता। यह चक्र चलता रहता है क्योंकि मनुष्य जो भी कर्म करता है उसका फल प्राप्त करने के लिए उस का आना जाना लगा रहता है। हम चाहे प्रेम करते हैं या नफरत, हमे अपने कर्मो का फल भोगना पड़ता है। सुख-दुख हमारे साथ चलते रहते हैं। पूर्वजन्म के कर्म ही हमें वर्तमान जन्म में एक दूसरे के निकट लाते हैं। चाहे हम किसी के ऋणी हो या कोई हमारा ऋणी हो। ये ऋण ही हमें आवागमन के चक्कर में फंसाये रखते हैं। हमारे मन ही के कारण कर्म होता है और कर्म ही के कारण आत्मा का आवागमन चलता रहता है। हमारे शरीर को प्रकृति ने बनाया है और मन को संस्कृति ने बनाया है। जब तक मन का अस्तित्व रहेगा तब तक यह मानव आत्मा बार-बार स्थूल शरीर ग्रहण करेगी और त्याग करेगी। यही जन्म मरण का खेल है। जब मानव अपनी आत्मा से मन को अलग कर देगा तो इसे आवागमन से छुटकारा मिल जाएगा और फिर वह परम शांति और परम विश्राम को प्राप्त कर लेता है। अब मन को शरीर से अलग करने के लिए मन और शरीर के बीच जो प्राण का स्पन्द काम करता है उस स्पन्द पर अधिकार जमाना पड़ता है। जब उस स्पन्द पर अधिकार हो जायेगा तो मन और शरीर का संबंध टूट जायेगा क्योंकि प्राण स्पन्द ही दोनों को एक दूसरे से मिलाता है। इस ज्ञान के होने पर हमे आवागमन के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। 

चित्र--गूगल साभार 

बुधवार, 30 सितंबर 2020

अंको का खेल


अंको का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। हमारे आसपास मौजूद अंक हमारे जीवन का रहस्य खोलते हैं। हमें आनेवाली हर घटनाओं के बारे में सचेत करते हैं। हम उन्हें समझने को तैयार है या नहीं इस के लिए हमें अपनी अंतर्दृष्टि का इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि यह ईश्वर ही है जो हमें अंको के माध्यम से हमे उत्तर देते हैं। जीवन और मृत्यु का खेल इन अंको के बीच समाया हुआ है। जब कभी भी हम दुविधा, परेशानी या अंसमजस में फंसे हुए हो तो हमें अपना उत्तर इन अंको के माध्यम से मिल जाता है। ईश्वर स्वयं प्रकट न हो कर अंको के माध्यम से हमारे जीवन का मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए जब कभी भी आपको बार बार कोई अंक दिखाई दे जैसे घड़ी में 5:55, 6:66 किसी सड़क पर बोर्ड पर, किसी वाहन पर एक ही अंक बार बार दिखाई दे तो उसके अर्थ को जान आगे का मार्ग निश्चित करे।

चित्र - - गगूल साभार 

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

श्री शिवाष्टक स्तोत्र


श्री शिवाष्टक स्त्रोत्र

जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणा-कर करतार हरे,
जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशि, सुख-सार हरे
जय शशि-शेखर, जय डमरू-धर जय-जय प्रेमागार हरे,
जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, अमित अनन्त अपार हरे,
निर्गुण जय जय, सगुण अनामय, निराकार साकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
जय रामेश्वर, जय नागेश्वर वैद्यनाथ, केदार हरे,
मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, जय, महाकाल ओंकार हरे,
त्र्यम्बकेश्वर, जय घुश्मेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे,
काशी-पति, श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अघहार हरे,
नील-कण्ठ जय, भूतनाथ जय, मृत्युंजय अविकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
जय महेश जय जय भवेश, जय आदिदेव महादेव विभो,
किस मुख से हे गुणातीत प्रभु! तव अपार गुण वर्णन हो,
जय भवकारक, तारक, हारक पातक-दारक शिव शम्भो,
दीन दुःख हर सर्व सुखाकर, प्रेम सुधाकर की जय हो,
पार लगा दो भव सागर से, बनकर करूणाधार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
जय मनभावन, जय अतिपावन, शोकनशावन,शिव शम्भो
विपद विदारन, अधम उदारन, सत्य सनातन शिव शम्भो,
सहज वचन हर जलज नयनवर धवल-वरन-तन शिव शम्भो,
मदन-कदन-कर पाप हरन-हर, चरन-मनन, धन शिव शम्भो,
विवसन, विश्वरूप, प्रलयंकर, जग के मूलाधार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
भोलानाथ कृपालु दयामय, औढरदानी शिव योगी,
सरल हृदय,अतिकरुणा सागर, अकथ-कहानी शिव योगी,
निमिष मात्र में देते हैं,नवनिधि मन मानी शिव योगी,
भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर, बने मसानी शिव योगी,
स्वयम्‌ अकिंचन,जनमनरंजन पर शिव परम उदार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
आशुतोष! इस मोह-मयी निद्रा से मुझे जगा देना,
विषम-वेदना, से विषयों की मायाधीश छुड़ा देना,
रूप सुधा की एक बूँद से जीवन मुक्त बना देना,
दिव्य-ज्ञान- भंडार-युगल-चरणों को लगन लगा देना,
एक बार इस मन मंदिर में कीजे पद-संचार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
दानी हो, दो भिक्षा में अपनी अनपायनि भक्ति प्रभो,
शक्तिमान हो, दो अविचल निष्काम प्रेम की शक्ति प्रभो,
त्यागी हो, दो इस असार-संसार से पूर्ण विरक्ति प्रभो,
परमपिता हो, दो तुम अपने चरणों में अनुरक्ति प्रभो,
स्वामी हो निज सेवक की सुन लेना करुणा पुकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
तुम बिन व्याकुल हूँ प्राणेश्वर, आ जाओ भगवन्त हरे,
चरण शरण की बाँह गहो, हे उमारमण प्रियकन्त हरे,
विरह व्यथित हूँ दीन दुःखी हूँ दीन दयालु अनन्त हरे,
आओ तुम मेरे हो जाओ, आ जाओ श्रीमंत हरे,
मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे।



सोमवार, 20 अगस्त 2018

उत्तर दिशा में क्यों नहीं सोए?




प्रकृति मे अनन्त शक्ति विद्यमान है।उस में से एक चुम्बकीय शक्ति भी है। ग्रह, नक्षत्र, तारे एक दूसरे से चुम्बकीय तरंगों से जुड़े हुए हैं। चुम्बक के आकर्षण और विकर्षक से ही यह पूरा ब्रह्मांड गतिशील है। हमारे शरीर से निकलने वाली ऊर्जा इन चुम्बकीय तरंगों से प्रभावित होती है।पृथ्वी के दो ध्रुव - उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिण ध्रुव के बीच इन चुम्बकीय तरंगों का प्रवाह होता रहता है।  हमारे शरीर पर इन तरंगों का सकारात्मक प्रभाव पडे, इसके लिए हमें सोने के लिए सही दिशा का ज्ञान होना चाहिए क्योंकि सोते समय हम पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति से जुड जाते हैं। उत्तर दिशा में सिर रखकर सोने से हमारे शरीर में रक्त के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। जिस से हम सुबह तरो ताजा नहीं रह पाते। बार-बार उत्तर दिशा में सिर रखकर सोने से हमे सिर दर्द, रक्त की कमी, तथा अन्य मस्तिष्क संबंधी बीमारियाँ भी हो सकती है। ह्रदय संबंधित रोग भी हो सकते हैं। हमारी शारीरिक ऊर्जा धीरे धीरे कम होती जाती है क्योंकि विपरीत चुम्बकीय खिंचाव आपके दिमाग पर दबाव डालेगा, जिससे शरीर सुस्त और आप की नाड़ी की गति धीमी हो सकती है। अगर आप की उम्र ज्यादा है तो लगातार इस दिशा में सोने से लकवा भी हो सकता है। अतः  पृथ्वी की सकारात्मक तरंगो का प्रभाव सोते समय हमारे शरीर पर पडे तथा शरीर स्वस्थ रहें, उस के लिए हमें उत्तर  दिशा में सिर रखकर नहीं सोना चाहिए। पूर्व दिशा में सिर रखकर सोने से  सात्विक तरंगे हमारे ब्रह्मरंध द्वारा हमारे शरीर में पहुंच कर हमें शारीरिक शक्ति तथा कुंडलिनी खोलने मे सहायक होती है इसलिए जो आध्यात्मिक ऊर्जा को बढाना चाहते हैं उन्हें पूर्व दिशा की ओर सोना चाहिए। पढने वाले बच्चों को भी इस दिशा में सोना चाहिए ताकि उनके मस्तिष्क का पूर्ण विकास हो पाए। दक्षिण दिशा में सोना उन लोगों के लिए लाभदायक होता है जिन्हें मानसिक तनाव ज्यादा रहता है। जिन बच्चों की लम्बाई अपनी उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रही हो उन्हें भी दक्षिण दिशा में सिर रखकर सोना चाहिए।


चित्र गूगल साभार 

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

स्वप्न ज्ञान



स्वप्नों का भी बडा विचित्र इतिहास है। हर सपने का भिन्न - भिन्न अर्थ होता है। ज्योतिष शास्त्र, तंत्र शास्त्र में भी स्वप्नों के विषय में काफी जानकारी दी गई है। मंत्रों द्वारा भी साधक को स्वप्नों द्वारा जानकारी मिल जाती है जिससे उसे भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी मिलती रहती है।
हर स्वप्न का अर्थ भिन्न - भिन्न होता है परंतु एक ही वस्तु के भिन्न - भिन्न अर्थ हो सकते है। कई बार हम स्वप्न मे कई चीजें एक साथ देखते हैं जिससे उस स्वप्न का अर्थ नकारात्मक होते हुए भी सकारात्मक हो जाता है। जैसे स्वप्न में हम ने किन्नर को देखा तथा साथ में गणपति जी को भी देखा। स्वप्न में खाली किन्नर को देखना अच्छा नहीं होता है। किन्नर का जीवन अधूरापन लिए होता है। ये स्वप्न देखने वाले के जीवन में धन, मान सम्मान तथा सेक्स से संबंधित  कमी को दर्शाता है। ज्योतिष शास्त्र में भी बुध ग्रह को मजबूत करने के लिए किन्नर को कुछ दान करने के लिए कहा जाता है। अब स्वप्न में किन्नर के साथ - साथ गणपति जी को देखना नकारात्मक का प्रभाव सकारात्मक में बदल जाता है। गणपति को देखना शुभ संकेत है। भविष्य में उन्नति, सुख संपत्ति, तथा मंगल कार्य का संकेत देता है। दोनों का स्वप्न में आना हमे यह दर्शाता है कि अगर आप के जीवन में जो अधूरापन है तो वह समाप्त हो जायेगा। धन, मान-सम्मान, तथा वैवाहिक जीवन का सुख प्राप्त होने का संकेत है।
इस प्रकार से स्वप्नों के जरिए हमे सटीक फल का मूल्यांकन करना चाहिए।

चित्र गूगल साभार 

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