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बुधवार, 4 अप्रैल 2012

टैरो कार्ड से जानें ...आपका आज का दैनिक राशिफल


टैरो कार्ड से जानें ...आपका आज का दैनिक राशिफल (04.04.2012 )
मेष (21 मार्च से 20 अप्रैल )...     कोई दबंग इंसान आप पर हावी रहेगा ।जिस से आप निराश हो सकते है।

वृषभ (21 अप्रैल से 20 मई ) …  आज किसी भी तरह का जोखिम न उठाये।

मिथुन (21 मई से 21 जून)....      आज आप का मन किसी भी काम मे नही लगेगा ।हो सके तो अपने अडियलपन का त्याग करे।
 
कर्क(22 जून से 22 जुलाई)...  आज अपनी सारी ताकत अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए करेगे ।

सिंह (23 जुलाई से 23 अगस्त  )...    आज का दिन आप काफ़ी व्यस्त रहेगे।   

कन्या (24 अगस्त से 23 सितंबर)... आज आप की इच्छा पूरी होगी ।

तुला (24 सितंबर से 23 अक्टूबर)…     किसी महिला के सहयोग से आप अपना रुतबा फिर हासिल कर पायेगे ।

वृश्चिक (24 अक्टूबर से 22 नवंबर )....  आज आप की दिल की मुराद पूरी होगी । भाग्य आप के साथ है ।

धनु (23 नवंबर से 21 दिसंबर )…  कठिनाईयो का अंत होगा। सफ़लता प्राप्त होगी ।

मकर (22 दिसंबर से 21 जनवरी )..आज शाम किसी पार्टी मे जाने का प्रोग्राम बनेगा ।  

कुंभ (22 जनवरी से 19 फरवरी)...     भाग्य आप के साथ है । मन की इच्छा पूरी होगी ।

मीन (20 फरवरी से 20 मार्च )..   चुनौती भरा दिन रहेगा ,फिर भी आप अपने आत्मविश्वास द्धारा अपनी मंजिल तक पहुँच जायेगे । 

(अंजना )

चित्र गूगल साभार )

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

टैरो कार्ड से जानें ...आपका आज का दैनिक राशिफल


टैरो कार्ड से जानें ...आपका आज का दैनिक राशिफल (03/04/2012)
मेष (21 मार्च से 20 अप्रैल )...    आज आप निराशा का दामन छोड पूरे आत्मविश्वास से कार्य करे ।

वृषभ (21 अप्रैल से 20 मई ) … आज कोई बुरी खबर मिल सकती है। जो आप पूरे अस्तित्व को प्रभावित कर सकती है ।

मिथुन (21 मई से 21 जून)....     आज प्यार मे धोखा मिल सकता है ।अगर कोई मुकदमा चल रहा है तो पराजय होगी ।
 
कर्क(22 जून से 22 जुलाई)... आप के मार्ग् पर विरोधी रोडे बिछायेगे लेकिन आपका रुतबा फिर भी कायम रहेगा ।  

सिंह (23 जुलाई से 23 अगस्त  )...  कोई नया काम शुरु न करे । रुकावट आयेगी इसलिए सावधानी बरते ।    

कन्या (24 अगस्त से 23 सितंबर)... आज कोई शुभ समाचार मिलेगा ।   

तुला (24 सितंबर से 23 अक्टूबर)…  आज आप को इच्छा के अनुरुप परिणाम प्राप्त नही होगा । जिस का कारण आप की लापरवाही होगी ।

वृश्चिक (24 अक्टूबर से 22 नवंबर )....  कारात्मक रवैया अपनाये,तभी समस्या दूर होगी।

धनु (23 नवंबर से 21 दिसंबर )… धन का नुकसान हो सकता है।

मकर (22 दिसंबर से 21 जनवरी ).. निराश खत्म होगी । सफलता प्राप्त होगी ।कोई नये कार्य की भी शुरुआत हो सकती है ।

कुंभ (22 जनवरी से 19 फरवरी)...    स्वार्थी न बने । हर खुशी पैसे से प्राप्त नही हो सकती । ये बात समझ कर चले ।

मीन (20 फरवरी से 20 मार्च )..  दूसरो के आदेश से काम करने के बजाय अपने अन्तरात्मा की आवाज सुनेगे तो सफलता प्राप्त होगी ।

(अंजना)

चित्र गूगल साभार 

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

टैरो कार्ड से जानें ...आपका आज का दैनिक राशिफल (30.3.2012)

टैरो कार्ड से जानें ...आपका आज का दैनिक राशिफल (30.3.2012)
मेष (21 मार्च से 20 अप्रैल )... आज का दिन अच्छा बीतेगा |पीछे आप ने जो भी  प्रयास किये है,उस का फ़ल आज आप को मिलेगा |

वृषभ (21 अप्रैल से 20 मई ) ...आज किसी पर भरोसा करे |दिल टूट सकता है |

मिथुन (21 मई से 21 जून)....  आज अपने रुपये-पैसे पर ध्यान दे वरना नुकसान की संभावना है |
 
कर्क(22 जून से 22 जुलाई)... आज आप का मन चिन्तित रहेगा |समझ नही पायेगे  कि क्या सही है क्या गलत |

सिंह (23 जुलाई से 23 अगस्त  )... आज कुछ लोग आप के मार्ग मे रुकावट डालेगे | कोई  नया काम शुरु करे |

कन्या (24 अगस्त से 23 सितंबर)...  जल्दबाजी क्रोध से बचे, मेहनत का फ़ल देर से मिलेगा |

तुला (24 सितंबर से 23 अक्टूबर)...आज मन भ्रमित मे रहेगा |क्या करे क्या करे वाली स्थिति रहेगी|

वृश्चिक (24 अक्टूबर से 22 नवंबर )....  आज का दिन मिला-जुला रहेगा |अगर कोई कोर्ट-केस चल रहा है,तो परिणाम अनुकूल होगा|

धनु (23 नवंबर से 21 दिसंबर )...आज कोई शुभ समाचार प्राप्त होगा |

मकर (22 दिसंबर से 21 जनवरी ).. आज का दिन निराशाजनक रहेगा |

कुंभ (22 जनवरी से 19 फरवरी)...  आज आप के मार्ग मे कोई महिला रुकावट पैदा कर सकती है |जिस से आप का मन निराश रहेगा|

मीन (20 फरवरी से 20 मार्च ).. किसी ऐसे काम मे हाथ डाले जिस की आप  को समझ हो |अपनी क्षमता से अधिक कार्य करे |

(anjana)

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

वेलेंटाइन डे


वेलेंटाइन डे पर अगर आप अपने प्रेमी या प्रेमिका को खुश करना चाहते है तो पहले अपने शुक्र ग्रह पर नजर डाले और साथ मे अपनी कुँड्ली मे पंचम भाव को भी देखें | पंचम भाव जो प्रेम का भी प्रतिनिधि है| उस की मजूबत स्थिति प्रेम को आगे लेकर जाती है|शुक्र ग्रह के मजूबत होने के साथ-साथ चंद्र ग्रह की स्थिति भी देखनी जरूरी है,चंद्रमा मन का कारक होता है इसलिए जहाँ शुक्र प्यार में आप की भावनाओ को व्यक्त करता है ,वहाँ चंद्र ग्रह आप के मन में उठते हुए जोश ओर उत्साह  को व्यक्त करता है| इस साल वेलेंटाइन डे पर चंद्रमा की सबल स्थिति होने के कारण प्रेमी-प्रेमिका के दिलों मे जोश ओर उत्साह बना रहेगा |  उस जोश को आप कितने साहस के साथ प्रदर्शित करते है |ये मंगल ग्रह पर निर्भर होता है,क्योकि मंगल साहस का प्रतीक है |जो आप को बिना किसी डर के अपने प्रेमी या प्रेमिका से मिलने की मंज़िल पर पहुँचा देता है | इन सब के अलावा आप की कुँडली में सातवां घर  भी देखना जरूरी है | जो घर विवाह का है | प्रेम को विवाह के अंजाम तक पहुँचाना  इसी घर पर निर्भर है| इस सब के बाद शुक्र की युति- प्रतियुति किस के साथ है, ये भी देखना जरूरी है |  प्यार की नैया को अगर मंज़िल तक पहुँचाना है तो पहले अपनी कुँडली के ग्रहो की स्थिति को देख ले | कहीं बाद मे आप का दिल ना टूट जाएँ ओर नैया बीच भँवर मे ही  ना डूब जाएँ और बाद मे पछताना पड़े |

बुधवार, 9 नवंबर 2011

पंचक


आज की पोस्ट पंचक के ऊपर है।पंचक अर्थात पाँच नक्षत्र-धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और
रेवती। इसमें जन्म और मृ्त्यु दोनो को अशुभ माना जाता है। अतः पंचक की शान्ति अवश्य करानी चाहिये।धनिष्ठा ,उत्तराभाद्रपद, शतभिषा, यें तीन नक्षत्र तमोगुणी नक्षत्र कहलाते है।पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र सतोगुणी तथा रेवती रजोगुणी नक्षत्र में आता है। धनिष्ठा नक्षत्र के देवता वसु तथा स्वामी मंगल है।शतभिषा नक्षत्र के देवता वरुण तथा स्वामी राहू है।पूर्वाभाद्रपाद जिसके देवता अहि तथा स्वामी गुरु है।उत्तराभाद्रपाद नक्षत्र के देवता नाग तथा स्वामी शनि है।रेवती नक्षत्र के देवता पितर तथा बुध है।पंचक में पाँच कर्म नही करने चाहिए।--
  1. तृ्ण और काष्ठ संग्रह करना ।
  2. मकान की छत डालना ।
  3. दक्षिण दिशा की यात्रा ।
  4. खटिया अथवा पंलग बनाना या बुनना ।
  5. प्रेतदाह
              इन सभी में प्रथम चार कार्य को तो रोका जा सकता है लेकिन प्रेतदाह अर्थात शव का दाह-संस्कार इसको टाला नही जा सकता है इसलिए अगर पंचक में किसी की मृ्त्यु हो जाएँ तो उसके परिहार के लिए शव के साथ पाँच पुतले बनाकर जलाये जाते है।जिससे इस अशुभ स्थिति को टाला जा सके ।कुशा के पाँच पुतले बना कर उनपर मौली लपेटकर उसे शव के साथ अर्थी पर रखकर तिल,शहद से पूजन कर पहला पुतला शव के सिर पर,दूसरा नेत्रो पर ,तीसरा दाई कूख पर,चौथा नाभी पर ,पाँचवा पैरो पर रखा जाता है।फिर इन नक्षत्र देवताओ की मंत्र द्धारा आहुति दी जाती है।
                  पंचक मे मृ्त्यु को अशुभ माना जाता है उसका तो परिहार कर दिया जाता है लेकिन पंचक मे जिस बालक का जन्म हो उसकी शान्ति भी जरुर करवानी चाहिए । जिस तरह गंड्मूल की पूजा में 27 वस्तुओ की जरुरत होती है ।उसी तरह पंचक शान्ति में सात वस्तुओ का महत्व होता है। सूतकोपरांत सात वृ्क्षों के पत्ते, सात धान्य, सात तिलहन से सब गर्म पानी में उबालकर उस पानी से बालक को स्नान करवाये । उबालने के लिए नया मिट्टी का बर्तन लें । घडे में सात छिद्र करे तथा छलनी में घास डालकर घडे के नीचे रखकर स्नान कराये ।यदि जन्म दिन का है तो पिता पानी डाले, अगर रात का जन्म है तो माता पानी डाले ।यदि सध्याकाल का जन्म है तो  दोनो पानी डाले। 
 कहा जाता है कि धनिष्ठा नक्षत्र में छत को डालना,दक्षिण दिशा की यात्रा,और चारपाई बनाना निषेध माना गया है क्योकि इसमे अग्नि भय होता है।शतभिषा नक्षत्र में कलह,पूर्वाभाद्रपाद में करने से रोग, उत्तराभाद्रपाद में करने से जुर्माना, रेवती नक्षत्र मे करने से धन की हानि होती है। 




चित्र गुगल साभार 

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

पितृपक्ष अर्थात श्राद्ध पक्ष

पितृपक्ष अर्थात श्राद्धपक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक रहते है।इसमें पितरों का तर्पण किया जाता है।श्राद्ध के द्वारा पितृ- ऋण से निवृति प्राप्त होती है।दिवंगत पूर्वजों की तिथि पर उनके निमित ब्राह्मणों को भोजन करा देने से हमारे पितृ खुश हो जाते है।पुरुष की तिथि पर ब्राह्मण को और स्त्री की तिथि पर ब्राह्मणी को भोजन कराया जाता है।भोजन कराने के बाद यथा शक्ति दान-दक्षिणा,वस्त्र देना चाहिए। दिवंगत पूर्वजों की प्रसन्नता ही पितृ ऋण से मुक्त करा देती है।इसे पार्वण श्राद्ध कहते है। पार्वण श्राद्ध के लिए अपराह्ण व्यापिनी तिथि ली जाती है। जिसकी मृत्यु की तिथि का पता न हो उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।श्राद्ध भोजन का समय दोपहर का होता है। जिसे कुतुप बेला कहते है।अमावस्या के दिन हमारे पितृगण वायु रुप में हमारे घर के दरवाजे पर उपस्थित रहते है और अपने स्वजनो से श्राद्ध की अभिलाषा करते है।जब तक सुर्य अस्त नही हो जाता तब तक वे वही भूख-प्यास से व्याकुल होकर खडे रहते है। जो श्राद्ध करते है वे उन्हे आयु ,पुत्र ,यश , कीर्ति , सुख ,धन और धान्य आदि का आर्शीवाद दे अपने लोक को चले जाते है।देवताओ से पहले पितरो को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी होता है।देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व होता है। वायु पुराण ,मत्स्य पुराण ,गरुण पुराण, विष्णु पुराण आदि पुराणों तथा अन्य शास्त्रों जैसे मनुस्मृति इत्यादि में भी श्राद्ध कर्म के महत्व के बारे में बताया गया है।श्राद्ध मे तिल बहुत पवित्र माने जाते है। तिल का प्रयोग करने पर असुर ,दानव और दैत्य भाग जाते है। एक ही तिल का दान स्वर्ण के बत्तीस सेर तिल के समान है।तिल तथा कुश की उत्पत्ति विष्णु जी के शरीर से हुई थी ।तिल विष्णु जी के पसीने से उत्पन्न हुए है तथा कुश की उत्पत्ति विष्णु जी के रोमों से हुई है इसलिए पितृकार्य में इसका विशेष महत्व होता है। कुश के मूल भाग में ब्रह्मा ,मध्य भाग में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास माना जाता है।श्राद्ध प्रेतजनों को जिस प्रकार से तृप्ति प्रदान करता है उस के लिए भगवान विष्णुजी ने कहा है कि "मनुष्य अपने कर्मानुसार यदि देवता हो जाता है तो श्राद्धान्न अमृत होकर उसे प्राप्त होता है और् वही अन्न गन्धर्व योनि में भोग रुप से तथा पशु योनि में तृणरुप में,नाग योनि में वायुरुप से,पक्षी योनि में जलरुप से और राक्षस योनि मे आमिष तथा दानव योनि के लिए मांस, प्रेत के लिए रक्त,मनुष्य के लिये अन्न-पानादि और बाल्यावस्था में भोग रस हो जाता है।




चित्र साभार - गूगल

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

ज्योतिष


ज्योतिष वेदांग के छः भागों का एक अंग है । पहले महाऋर्षिगण नि:स्वार्थ रुप से लोगों की भलाई के लिए इस विद्या का उपयोग करते थे लेकिन आज ये केवल व्यवसाय का रुप बनती जा रही है ।मैं भी ज्योतिष की विद्यार्थी हूँ क्योकि यह विद्या अथाह सागर का भंडार है।मेरे अपने तर्क से कोई भी इस में परिपूर्ण नहीं है। जितनी बार इसे हम पढ्ते है नया से नया ज्ञान प्राप्त होता है। आज इस पर शोध करने की आवश्कता है ताकि लोगों मे पल रहे इस के प्रति अज्ञान व अंधविश्वास को दूर किया जा सके ।पहले के महाऋर्षियों के पास दिव्यदृ्ष्टि होती थी जो अपनी सूक्ष्म दृ्र्ष्टि द्धारा भूत, भविष्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया करते थे ।जातक की कुंडली को देखकर उस के भविष्य में घटित होने वाली शुभ अशुभ घटनाओं को देखा जा सकता है, न कि इसे टाला जा सके ।ज्योतिष के माघ्यम से हम उस के भविष्य की बुरी घट्ना को टालने की विधियां जरुर बता सकते है लेकिन उसे सम्पूर्ण रुप से नष्ट नहीं कर सकते है।प्रारब्ध कर्म तो उसे भोगना ही पड्ता है। हमारा जीवन जब दुखी होता है तो उसे सुखी बनाने के लिए ज्योतिषी के पास जाते है लेकिन ज्योतिषी कोई भगवान नहीं है ! ऎसा ही एक किस्सा सुनाती हूँ । एक महिला मेरे पास किसी की शादी के सिलासले मे आई । कहने लगी कि बहुत पंडितो को देखा दिया है सभी कहते है कि शादी का योग तो चल रहा है लेकिन फिर भी पता नही क्यों इसकी शादी नही हो रही है आप ऎसा कुछ उपाय बताएँ कि थोडे ही दिनों में इस की शादी हो जाएँ । मैने उस की कुंडली को देखा और कहा कि कल बताऊंगी क्योंकि मैं इतनी जल्दी इस का उत्तर नही देना चाहती थी । आखिर इतने पंडितों से पूछ कर जो मेरे पास आई थी! तो उस कुडंली का गंभीर विश्लेषण मेरे लिए जरुरी था । कल फिर वह महिला आई मैने उसे कहा कि अभी इसका विवाह का योग नही है । तीन साल के बाद विवाह होगा । अब वह कहने लगी कि कोई पूजा,दान,से बात नही बन सकती । अब हार कर मैने कुछ उपाय बता दिएं और कहा कि इन उपायों को वह कर लेती है तो उसके बाद जब लड्का देखने जाएं तो मुझे जरुर बता देना उस समय जो बताऊंगी फिर वह कर लेना ।प्रकृति के आगे इंसान का कोई बस नहीं चलता यही हुआ वह लडकी उन उपायो को नही कर पाई ।तीन चार महीने बाद उन उपायो को वह कर पाई । अब क्या था दो महीने के बाद उस ने बताया कि दो दिन बाद हम लडका देखने जा रहे क्या बात बन जाएंगी ? मैने कहा ठीक है जब लडका देख लोगे अगर पंसन्द आये तो मुझे फोन कर देना मै एक उपाय उसी समय करने को कहूंगी वह कर लिया तो रिश्ता पक्का समझना । अचानक मुझे पता चला कि गुरु जी ने दो दिन साधना की शिक्षा देनी है । मै चली गई । अब कक्षा में मोबाइल बंद रखना पडता है तो उसका मुझसे संपर्क न हो पाया । बाद मे पता चला कि उस ने हमे काफ़ी फोन किया था और उस ने बताया कि लड्का अच्छा था हमे पंसन्द था उन की तरफ से हां ही लग रही थी पर न जाने क्या हुआ कि उन का बाद मे फोन आया कि हमे ये रिश्ता नही करना ।वास्तव मे प्रकृति के आगे किसी का बस नही है । संचित और प्रारब्ध कर्मो का फल जातक को अपने इस जीवन में भोगना ही पड्ता है । थोडे बहुत उपायों द्धारा उसे हम कम कर सकते है लेकिन मिटाना किसी भी ज्योतिषी के हाथ में नही इसलिए मैंने पहले जो कहा कि इस पर शोध की आवश्यकता है उस के लिए निःस्वार्थ आगे आने की जरुरत है । वैसे तो संगीता जी, पंडित शर्मा जी का प्रयास भी प्रशंसनीय है । लेकिन औरो को भी आगे आना चाहिए ताकि इस शास्त्र की उन्नति हो सके और जो अपने स्वार्थ वश इस विद्या को कंलकित कर रहे है,उन से इसे बचाया जा सके। इस शास्त्र के गौरव की रक्षा के लिए अनुसन्धान कार्य में सरकार को भी मदद करनी चाहिए ।


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार

रविवार, 25 जुलाई 2010

गुरु पूर्णिमा की बहुत बहुत शुभकामनाएँ

 गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेवो महेश्वर:।'

गुरु साक्षात् परब्रह्म् तस्मै श्री गुरुवे नम:।।


गुरु पूर्णिमा का यह पर्व आषाढ मास की पूर्णमासी को मनाया जाता है।यह पर्व गुरु को अर्पित पर्व है। इस दिन अपने गुरुजी अथवा कुलगुरु की पूजा करनी चाहिए । श्रीकृ्ष्ण जी ने भी गुरु भक्ति के विषय में श्रीमदभागवत के एकाद्श स्कंध के अठारहवें अध्याय के 29 वें श्लोक में कहा है --


"तावत परिचरेद भक्तः श्रद्धावान न सूचक: ।


यावत ब्रह्म विजानीयान्ममेव गुरुमादृ्तः ।।"


अर्थात प्रभु कहते है -कि गुरु के प्रति पूर्ण सम्मान .द्दढ भक्ति और पूर्ण श्रृद्धा रखते हुए ब्रह्म प्राप्ति का पूर्ण मार्ग दर्शन प्राप्त होने तक गुरु के प्रति जरा भी शंका न करे ।न ही उन के किसी दोष के प्रति ध्यान दे।ब्रह्म प्राप्ति होने तक मुझे ही गुरु के रुप में देखे ।


गुरु रुहानी सृष्टि के बाद्शाह होते है। वह हम पर जो उपकार करते है । उस उपकार का मूल्य हम कभी नही चुका सकते है। वह ही हमारे सच्चे मित्र होते है।हमारी रक्षा हर मुश्किल में तथा लोक परलोक में भी संग होते है । अगर हम सदगुरु को परमात्म-स्वरुप समझकर प्रेम और श्रृद्धा से उनकी उपासना करते है तो शीघ्र ही जीवन की परम मंजिल को प्राप्त कर लेते है।वास्तव में पूर्ण सदगुरु मसीहा हैं जो धरा पर जन-कल्याण हेतु आते हैं ।परमात्मा से भी बडा सतगुरु का स्थान है तभी तो कबीर दास जी ने कहा है--कि


"गुरु गोंविन्द दोऊ खडे काके लागूँ पाँय ।


बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय ।"


अंत में श्री सदगुरु जी के श्री चरणों में कोटि- कोटि प्रणाम कर इतना ही कहूंगी कि सतगुरु ही दाता है, सच्चे नाम के इस जग में, तीनों लोको में नहीं ,सतगुरु सम कोई मीत ।


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार

सोमवार, 19 जुलाई 2010

अशुभ क्रकच योग

अशुभ क्रकच योग


 20 जुलाई 2010 मंगलवार ,दशमी तिथि को यह अशुभ क्रकच योग उत्पन्न हो रहा है । तिथि और वार के अंको का योग यदि 13 हो तो क्रकच नामक योग होता है । ऎसा योग मंगल कार्यो के लिए अमंगलकारी माना जाता है इसलिए ऎसे योग में शुभ कार्यो को नही करना चाहिए । ऎसे योग का  का वर्णन इस प्रकार से है :-

 वार रवि          सोम       मंगल      बुध         गुरु       शुक्र       शनि
अंक    1               2           3          4            5             6               7
तिथि द्धादशी    एकादशी   दशमी   नवमी      अष्टमी    सप्तमी      षष्ठी


 जैसे ---मंगलवार का अंक 3 और दशमी तिथि का 10 जो 10 +3=13 होता है ।

चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार


मंगलवार, 13 जुलाई 2010

रथ यात्रा

आज भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का पर्व है । भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा आषाढ शुक्ल पक्ष की दूज को मनाई जाती है।रथ यात्रा के इस पवन दिन श्री बलराम जी ,श्री कृष्णजी और देवी सुभद्रा जी का पूजन किया जाता है। श्री बलराम जी ,श्री कृष्णजी और देवी सुभद्रा जी की प्रतिमाएं को सुन्दर वस्त्रो,हार श्रृंगार और पुष्प मालाओ से सुसजित कर झांकी यात्रा निकाली जाती है।




हर साल रथो का निर्माण होता है । श्री जगन्नाथ जी का रथ जिसे नंदीघोष रथ कहा जाता है ।उन्हे लाल -पीले रंगो के कपडे से सजाया जाता है ।इस रथ में 16 पहिए लगे होते है । श्री बलभद्र जी का रथ जिसे तालध्वज रथ कहा जाता है इसे भी लाल-हरे रंगो के कपडे से सजाया जाता है।इस रथ की एक पहचान यह भी है कि इस रथ पर खजूर की पत्तियों का झंडा होता है।इस रथ में 14 पहिये होते है। दर्पदलम रथ जो देवी सुभद्रा जी का होता है।यह काले लाल कपडे से सजा होता है।जो शक्ति का प्रतीक होता है ।इस रथ में 12 पहिये लगे होते है । सोने के मूठ वाले चामर से सभी रथो पर बारी बारी चामर झला जाता है। भगवान जगन्नाथ इस दिन अपने बडे भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अलग अलग रथो मे बैठकर अपने जन्मस्थान गुण्डिचा मंदिर की ओर यात्रा करते है। इस दिन लोग व्रत भी रखते है ।ऎसा कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने वालो पर भगवान शेषनाग रक्षा करते है और उन्हे सब सुख-ऎश्वर्य प्रदान कर उन के सभी पापो का नाश करते है ।




भगवान जगन्नाथ जी का ये मंदिर 400 साल पुराना है । इस मंदिर के विषय मे यह कहा जाता है कि जिस शिल्पकार ने इन मूर्तियों का निर्माण किया था वह इन मूर्तियो के पैर तथा हाथ की कलाई नही बना पाया था और तभी आकाश वाणी हुई कि इन मूर्तियों को ऎसे ही स्थापित कर दिया जाएँ ।तब से ये मूर्तियाँ ऎसी ही स्थापित कर दी गई |


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार

सोमवार, 12 जुलाई 2010

नवरात्रे

सोमवार 12 जुलाई 2010 आषाढ शुक्लपक्ष प्रतिपदा तिथि, को माता का पहला नवरात्रा है। वैसे तो साल मे दो बार ही नवरात्र बनाया जाता है।एक चैत्र शुक्ल पक्ष के महीने मे और दूसरा आश्विन शुक्ल पक्ष के माह मे लेकिन दो बार ओर नवरात्रे आते है जिसे गुप्त नवरात्रा कहा जाता है ।वह गुप्त नवरात्रा एक तो आषाढ शुक्ल पक्ष मास मे और दूसरा गुप्त नवरात्रा माघ शुक्ल पक्ष के मास मे आता है। ये गुप्त नवरात्रे साधना सिद्धि के लिए होते है।तांत्रिक सिद्धि के लिए ये गुप्त नवरात्रे बहुत उपयुक्त होते है। गृहस्थ व्यक्ति को भी   इन दिनो मे माँ की पूजा आराधना कर और कुण्डलिनी शक्ति जागाकर क्रियाशील करनी चाहिए । ब्रह्मा,विष्णु,रुद्र,ईश्वर,सदाशिव और परशिव ये शिव कहलाते है । डाकिनी, राकिनी, लाकिनी, काकिनी, शाकिनी और हाकिनी ये छह शक्तियाँ है जो क्रमशःषटचक्र के अधिष्टातृ देवी-देवता है।साधना कर साधक शिव-शक्ति रुप मे परमात्मा का दर्शन पाते है। इन दिनो मे साधको के साधन का फल व्यर्थ नही जाता है ।माँ अपने भक्तो को उनकी साधना के अनुसार फल देती है। इन दिनो मे दान पुण्य का भी बहुत महत्व होता है।


चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार



शनिवार, 12 जून 2010

शनैश्चरी अमावस्या


 आज 12-06-2010 ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष,रोहिणी नक्षत्र ,शनैश्चरी अमावस्या है।चंद्र का संचार मिथुन राशि पर है।आज ही शनि जयंती,भावुका अमावस्या और वट सावित्री व्रत भी है । इन सब के साथ-साथ आज सर्वार्थ सिद्ध योग भी है।इस शक्तिशाली योग मे प्रारम्भ किये अभीष्ट कार्यो में सफलता प्राप्त होती है। ये शनि जयंती चार साल के बाद आई है और अगला यह योग 2013 में बनेगा।इस दिन शनि देव की पूजा के साथ-साथ हनुमान जी की भी पूजा करनी चाहिए ।

सिंह , कन्या, तुला राशि पर अभी साढेसाती और मिथुन, कुंभ राशि पर शनि की ढैय्या चल रही है। ऎसे जातको को इस दिन शनि देव जी की प्रतिमा का पूजन कर तेल से अभिषेक करना चाहिए ।अगर कोई रोगी है तो उसे इस दिन तेल भरे बर्तन मे अपना मुंह देखकर पात्र सहित दान मे देना चाहिए ।जिन की कुंडली में 1,4,5,6, भाव मे अकेला अशुभ शनि बैठा हुआ है उसे यह उपाय जरुर करना चाहिए ।


जिन का लोहे, सरसो के तेल,कोयला,स्पिरिट ,लकडी अर्थात शनि के संबधित व्यवसाय हो उन्हे इस अदभुत संयोग से बने इस दिन मे शनि से संबधित वस्तुओ का दान और उनके मंत्रो का जाप जरुर करना चाहिए । शनि दान मे उडद की दाल ,तेल, लोहा ,चिमटा ,चमडा ,अंगीठी, पत्थर वाला कोयला, काले तिल ,का दान करना चाहिए ।इससे शनि-प्रकोप दूर होता है और शनि देव कृपा करते है। शनि कल्याण करते है तो जमाने भर की दौलत प्रदान करते है ।


संतान की प्राप्ति के लिए आज वट सावित्री व्रत का बहुत महत्व है। संतान प्राप्ति के इच्छुक वट वृक्ष का पूजन कर शाम को वट वृक्ष के नीचे सरसो या तिल के तेल का दीपक जरुर जलाएँ। इस व्रत को करने से सुख,सौभाग्य और संतान की प्राप्ति होती है। जिन की कुंडली में ग्रहो का अरिष्ट योग है,इस व्रत को करने से वह दोष दूर होता है।पुराणो के अनुसार इस वृक्ष मे सावित्री, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव का वास होता है इसलिए इस दिन औरते वृक्ष के चारो तरफ़ 108 या 7 बार प्रदक्षिणा कर सूत का धागा लपेट कर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण करती है। जिन कन्याओ के विवाह न हो रहा हो वह भी इस व्रत को करे तो उन के विवाह के योग बन जायेगे ।


शनि की शान्ति के लिए सुबह गंगाजल,काले तिल,दूध लेकर पीपल की जड मे डाले और शाम को इस वृक्ष के नीचे दीपक जलाये। शुक्रवार को काले चने भीगो दे ।अगले दिन शनिवार को उसे काले कपडे में रख कर साथ मे लोहे की हल्की पत्ती और कच्चा कोयला डाल कर उस कपडे को बाँधकर जहाँ मछलियाँ हो उस पानी में प्रवाहित करे।ऎसा माना जाता है कि यह दान मोती दान के बराबर होता है।







(अंजना )

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

पुरुषोत्तम मास

पुरुषोत्तम मास जिसे मल मास,लोंद का महीना और अधिक मास के नाम से भी जाना जाता है।अधिक मास 32 महीना 16 दिन और 4 घडी के अन्तर मे आया करता है।जो महीना सूर्य संक्रान्ति से रहित हो उसे मल-मास कहते है।जिस महीने मे अधिक मास आता है,उसमे चार पक्ष होते है।प्रथम और चतुर्थ पक्ष शुद्ध महीने के होते है तथा द्धितीय और तृतीय पक्ष अधिक मास कहलाते है यानि शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से शुरु होकर कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक अधिक मास होता है। अंग्रेजी वर्ष 2010 के तिथि अनुसार 15-04-2010 से 14-05-2010 तक वैशाख मास अधिक मास के रुप मे है।इस मास मे भगवान पुरुषोत्तम की नित्य पूजा की जाती है तथा उन की कथा सुनी जाती है।इस माह में एक काँसे की थाली में मिठाई तथा दक्षिणा रखकर कपडे में बाँध कर किसी ब्राह्मण को दान करना अच्छा होता है। वैसे भी इस मास व्रत , उपवास, दान ,पूजा आदि का बहुत महत्व माना जाता है।अगर सम्भव हो तो इस मास एक समय भोजन का नियम बनाकर व्रत करे । जो व्रत न कर सके वो भी अगर भगवान राधा-कृष्ण जी का पूजन करे ,अर्ध्य दे और प्रार्थना करे तथा नैवेद्य मे घी,गेहूँ के बने पदार्थ मालपूडा,फल,आदि का भोग लगाये तो उसे भी प्रभु की कृपा प्राप्त होती है क्योकि इस मास मे व्रत और दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, तथा व्रत करने वाले के अनिष्ट खत्म हो जाते है। अधिक मास मे कोई भी शुभ कार्य नही करना चाहिए जैसे विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन ,काम्य कर्म अर्थात फल प्राप्ति की कामना के लिए किए वाले काम नही करने चाहिए। हर साल 24 एकादशियाँआती जाने है लेकिन जिस वर्ष मल मास हो उस साल 26एकादशियाँ आती है ।मल मास की ये दो एकादशियो का बहुत महत्व है ,साथ ही अधिक मास की पूर्णिमा का भी बहुत महत्व है। जो इन व्रतो को करता है उसे प्रभु की कृपा प्राप्त होती है और प्रभु उसके सभी कष्टो को दूर कर देते है।



हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

रविवार, 21 मार्च 2010

मेरी कूची व कलम से




जन्म होने की खुशी
और मौत का रंज
ये तो दस्तूर है पुराना
मुक्त होगे कब हम
इन आदतो और इच्छाओ
से जकडे पिंजरो की जंजीरो से
आजादी की डोर है पास अपने
फिर भी बन अंजान यूही
कब तक ढोयेगे इन जंजीरो को
हुआ है मुश्किल हाय क्या करे !
निकलता है जब गम नया
सुख भी जाता है छिप
बादल की ओट मे ।

सोमवार, 15 मार्च 2010

महाकुम्भ पर्व का द्धितीय शाही स्नान



विक्रम संवत् 2066 ,चैत्र मास कृष्ण पक्ष अमावस्या सोमवार दिनांक 15 मार्च 2010 को आज हरिद्धार मे महाकुम्भ पर्व का द्धितीय शाही स्नान है। आज सोमवती अमावस्या भी है ।आज सूर्य और चंद्र का अद्भूत् संयोग है ।सोमवती अमावस्या और महाकुम्भ का यह अद्भूत् संयोग 760 वर्ष के बाद हुआ है।पवित्र नदियो मे स्नान करना पुण्यदायक माना जाता है लेकिन यही स्नान जब विशेष पर्वो पर हो तो इस का महत्व कई गुना अधिक हो जाता है। हमारे शास्त्रो मे कुम्भ के इस महापर्व मे स्नान का बहुत महत्व बताया है। हजारो स्नान कार्तिक मास मे ,सैकडो स्नान माघ मे और वैशाख मास मे करोडो बार नर्मदा नदी मे स्नान किये हो ,इन सभी के स्नान का फल एक बार कुम्भ मे स्नान करने से मिल जाता है। हजारो अश्वमेघ यज्ञ,सैकडो वाजपेय यज्ञ करने तथा लाखो प्रदक्षिणा पृथ्वी की करने पर जो फल मिलता है वही फल कुम्भ पर्व मे स्नान से मिलता है। स्नान करते समय अपने दोनो हाथो द्धारा कुम्भ- मुद्रा (कलश मुद्रा ) दिखाकर और उसमे अमृत की भावना कर स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद गणपति जी का पूजन करने से पहले कलश की स्थापना करनी चाहिए ।फिर कलश का षोडशोपचार पूर्वक एक, चार, ग्यारह, इक्कीस अथवा यथा शाक्ति सुवर्ण, रजत, ताम्र, या पीतल के कलशों में धृत भर कर योग्य विद्धान को ' घृत कुम्भ ' का दान करना चाहिए। वैसे भी कुम्भ पर्व के समय घृतपूर्ण कुम्भ (कलश) का पूजन कर वस्त्र,अंलकार,आभूषण तथा सुवर्ण खण्ड सहित सदाचारी विद्धान को देने से सैकडो गोदान ,तीर्थ यात्रा और अश्वमेघ यज्ञ करने का फल मिलता है तथा मनुष्य के पितरो की आत्मा संतुष्ट होती है।

चित्र गूगल से



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