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शनिवार, 12 जून 2010

शनैश्चरी अमावस्या


 आज 12-06-2010 ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष,रोहिणी नक्षत्र ,शनैश्चरी अमावस्या है।चंद्र का संचार मिथुन राशि पर है।आज ही शनि जयंती,भावुका अमावस्या और वट सावित्री व्रत भी है । इन सब के साथ-साथ आज सर्वार्थ सिद्ध योग भी है।इस शक्तिशाली योग मे प्रारम्भ किये अभीष्ट कार्यो में सफलता प्राप्त होती है। ये शनि जयंती चार साल के बाद आई है और अगला यह योग 2013 में बनेगा।इस दिन शनि देव की पूजा के साथ-साथ हनुमान जी की भी पूजा करनी चाहिए ।

सिंह , कन्या, तुला राशि पर अभी साढेसाती और मिथुन, कुंभ राशि पर शनि की ढैय्या चल रही है। ऎसे जातको को इस दिन शनि देव जी की प्रतिमा का पूजन कर तेल से अभिषेक करना चाहिए ।अगर कोई रोगी है तो उसे इस दिन तेल भरे बर्तन मे अपना मुंह देखकर पात्र सहित दान मे देना चाहिए ।जिन की कुंडली में 1,4,5,6, भाव मे अकेला अशुभ शनि बैठा हुआ है उसे यह उपाय जरुर करना चाहिए ।


जिन का लोहे, सरसो के तेल,कोयला,स्पिरिट ,लकडी अर्थात शनि के संबधित व्यवसाय हो उन्हे इस अदभुत संयोग से बने इस दिन मे शनि से संबधित वस्तुओ का दान और उनके मंत्रो का जाप जरुर करना चाहिए । शनि दान मे उडद की दाल ,तेल, लोहा ,चिमटा ,चमडा ,अंगीठी, पत्थर वाला कोयला, काले तिल ,का दान करना चाहिए ।इससे शनि-प्रकोप दूर होता है और शनि देव कृपा करते है। शनि कल्याण करते है तो जमाने भर की दौलत प्रदान करते है ।


संतान की प्राप्ति के लिए आज वट सावित्री व्रत का बहुत महत्व है। संतान प्राप्ति के इच्छुक वट वृक्ष का पूजन कर शाम को वट वृक्ष के नीचे सरसो या तिल के तेल का दीपक जरुर जलाएँ। इस व्रत को करने से सुख,सौभाग्य और संतान की प्राप्ति होती है। जिन की कुंडली में ग्रहो का अरिष्ट योग है,इस व्रत को करने से वह दोष दूर होता है।पुराणो के अनुसार इस वृक्ष मे सावित्री, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव का वास होता है इसलिए इस दिन औरते वृक्ष के चारो तरफ़ 108 या 7 बार प्रदक्षिणा कर सूत का धागा लपेट कर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण करती है। जिन कन्याओ के विवाह न हो रहा हो वह भी इस व्रत को करे तो उन के विवाह के योग बन जायेगे ।


शनि की शान्ति के लिए सुबह गंगाजल,काले तिल,दूध लेकर पीपल की जड मे डाले और शाम को इस वृक्ष के नीचे दीपक जलाये। शुक्रवार को काले चने भीगो दे ।अगले दिन शनिवार को उसे काले कपडे में रख कर साथ मे लोहे की हल्की पत्ती और कच्चा कोयला डाल कर उस कपडे को बाँधकर जहाँ मछलियाँ हो उस पानी में प्रवाहित करे।ऎसा माना जाता है कि यह दान मोती दान के बराबर होता है।







(अंजना )

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

पुरुषोत्तम मास

पुरुषोत्तम मास जिसे मल मास,लोंद का महीना और अधिक मास के नाम से भी जाना जाता है।अधिक मास 32 महीना 16 दिन और 4 घडी के अन्तर मे आया करता है।जो महीना सूर्य संक्रान्ति से रहित हो उसे मल-मास कहते है।जिस महीने मे अधिक मास आता है,उसमे चार पक्ष होते है।प्रथम और चतुर्थ पक्ष शुद्ध महीने के होते है तथा द्धितीय और तृतीय पक्ष अधिक मास कहलाते है यानि शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से शुरु होकर कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक अधिक मास होता है। अंग्रेजी वर्ष 2010 के तिथि अनुसार 15-04-2010 से 14-05-2010 तक वैशाख मास अधिक मास के रुप मे है।इस मास मे भगवान पुरुषोत्तम की नित्य पूजा की जाती है तथा उन की कथा सुनी जाती है।इस माह में एक काँसे की थाली में मिठाई तथा दक्षिणा रखकर कपडे में बाँध कर किसी ब्राह्मण को दान करना अच्छा होता है। वैसे भी इस मास व्रत , उपवास, दान ,पूजा आदि का बहुत महत्व माना जाता है।अगर सम्भव हो तो इस मास एक समय भोजन का नियम बनाकर व्रत करे । जो व्रत न कर सके वो भी अगर भगवान राधा-कृष्ण जी का पूजन करे ,अर्ध्य दे और प्रार्थना करे तथा नैवेद्य मे घी,गेहूँ के बने पदार्थ मालपूडा,फल,आदि का भोग लगाये तो उसे भी प्रभु की कृपा प्राप्त होती है क्योकि इस मास मे व्रत और दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, तथा व्रत करने वाले के अनिष्ट खत्म हो जाते है। अधिक मास मे कोई भी शुभ कार्य नही करना चाहिए जैसे विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन ,काम्य कर्म अर्थात फल प्राप्ति की कामना के लिए किए वाले काम नही करने चाहिए। हर साल 24 एकादशियाँआती जाने है लेकिन जिस वर्ष मल मास हो उस साल 26एकादशियाँ आती है ।मल मास की ये दो एकादशियो का बहुत महत्व है ,साथ ही अधिक मास की पूर्णिमा का भी बहुत महत्व है। जो इन व्रतो को करता है उसे प्रभु की कृपा प्राप्त होती है और प्रभु उसके सभी कष्टो को दूर कर देते है।



हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

रविवार, 21 मार्च 2010

मेरी कूची व कलम से




जन्म होने की खुशी
और मौत का रंज
ये तो दस्तूर है पुराना
मुक्त होगे कब हम
इन आदतो और इच्छाओ
से जकडे पिंजरो की जंजीरो से
आजादी की डोर है पास अपने
फिर भी बन अंजान यूही
कब तक ढोयेगे इन जंजीरो को
हुआ है मुश्किल हाय क्या करे !
निकलता है जब गम नया
सुख भी जाता है छिप
बादल की ओट मे ।

सोमवार, 15 मार्च 2010

महाकुम्भ पर्व का द्धितीय शाही स्नान



विक्रम संवत् 2066 ,चैत्र मास कृष्ण पक्ष अमावस्या सोमवार दिनांक 15 मार्च 2010 को आज हरिद्धार मे महाकुम्भ पर्व का द्धितीय शाही स्नान है। आज सोमवती अमावस्या भी है ।आज सूर्य और चंद्र का अद्भूत् संयोग है ।सोमवती अमावस्या और महाकुम्भ का यह अद्भूत् संयोग 760 वर्ष के बाद हुआ है।पवित्र नदियो मे स्नान करना पुण्यदायक माना जाता है लेकिन यही स्नान जब विशेष पर्वो पर हो तो इस का महत्व कई गुना अधिक हो जाता है। हमारे शास्त्रो मे कुम्भ के इस महापर्व मे स्नान का बहुत महत्व बताया है। हजारो स्नान कार्तिक मास मे ,सैकडो स्नान माघ मे और वैशाख मास मे करोडो बार नर्मदा नदी मे स्नान किये हो ,इन सभी के स्नान का फल एक बार कुम्भ मे स्नान करने से मिल जाता है। हजारो अश्वमेघ यज्ञ,सैकडो वाजपेय यज्ञ करने तथा लाखो प्रदक्षिणा पृथ्वी की करने पर जो फल मिलता है वही फल कुम्भ पर्व मे स्नान से मिलता है। स्नान करते समय अपने दोनो हाथो द्धारा कुम्भ- मुद्रा (कलश मुद्रा ) दिखाकर और उसमे अमृत की भावना कर स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद गणपति जी का पूजन करने से पहले कलश की स्थापना करनी चाहिए ।फिर कलश का षोडशोपचार पूर्वक एक, चार, ग्यारह, इक्कीस अथवा यथा शाक्ति सुवर्ण, रजत, ताम्र, या पीतल के कलशों में धृत भर कर योग्य विद्धान को ' घृत कुम्भ ' का दान करना चाहिए। वैसे भी कुम्भ पर्व के समय घृतपूर्ण कुम्भ (कलश) का पूजन कर वस्त्र,अंलकार,आभूषण तथा सुवर्ण खण्ड सहित सदाचारी विद्धान को देने से सैकडो गोदान ,तीर्थ यात्रा और अश्वमेघ यज्ञ करने का फल मिलता है तथा मनुष्य के पितरो की आत्मा संतुष्ट होती है।

चित्र गूगल से



मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

108 की संख्या





108 की संख्या का ऎसा क्या रहस्य है कि ये संख्या पवित्र और शुद्ध मानी जाती है। मंत्र जाप मे भी 108 की संख्या का मह्त्व है क्योकि 108 दानो की माला चाहे वो रुद्राक्ष हो या तुलसी की माला हो ,सर्व सिद्धिदायक मानी गयी है। 108 की संख्या का हमारे मंत्र जाप से क्या संबध है ? इस गूढ रहस्य का भेदन कर जो परिणाम सामने आता है।उसके लिए हमे अपने प्राचीन ऋषियो के चिन्तन और अगाध ज्ञान पर श्रद्धा से नतमस्तक होना पडता है। मोक्ष प्राप्त करना मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य है और इसे प्राप्त करने के लिए योगी जन शरीर के अन्दर स्थित सात चक्रो के भेदन करते है। इसे कुण्डली जागरण कहते है। मूलाधार चक्र पहला चक्र है और सहस्त्रधार चक्र सातवां आखिरी चक्र है|
अंक ज्योतिष के आधार पर 1 का अंक सूर्य का है। जो कि मूलाधार चक्र से संबन्धित है। एक अंक जो ब्रह्म का बोधक है,जब वह अद्वैत रुप से रहता है।
अंक 0 शब्द के मूल आकाश को शून्य कहते है और अंक के मूल को भी शून्य ,शून्य से ही शब्द और अंक की उत्पति होती है।यह पूर्णता का प्रतीक है।
अंक 8 जो शनि का है । जो सहस्त्रधार चक्र से सबंन्धित है।जिसका स्थान सिर के ऊपर होता है।यह सातवां आखिरी चक्र है। जो माया का प्रतीक है।जिस प्रकार से आठ का पहाडे को गुणा करने पर गुणनफल जोडने पर योग घटता-बढता रहता है।यानि ---
8x1=8
8x2=16=1+6=7
8x3=24=2+4=6
8x4=32=3+2=5
8x5=40=4+0=4
8x6=48=4+8=12=1+2=3
8x7=56=5+6=11=1+1=2
8x8=64=6+4=10=1+0=1
8x9=72=7+2=9
8x10=80=8+0=8

इसी प्रकार माया का भी यही हाल है जो निरंतर घटती बढती रहती है ,लेकिन जब ब्रह्म रुपी एक अंक और पूर्णता रुपी शून्य अंक आता है तो माया तितर-बितर हो जाती है। इसीलिए 108 की संख्या सर्वसिद्धि दायक मानी जाती है। इस संख्या का जितना महत्व है, उतना ही इस संख्या मे छुपा रहस्य भी महत्वपूर्ण है।


रविवार, 17 जनवरी 2010

खंडित आत्मा


पिछले लेख मे मैने आत्मा के दो खंडो के बारे मे चर्चा की थी ।जिसमे एक खंड स्त्री तत्व और दूसरा पुरुष तत्व है।वास्तव मे आत्मा के भी वर्ग है ।उच्च, मध्यम और निम्न । जब कालचक्र मे घूमती हुई एक ही वर्ग की आत्माएँ आपस मे मिलती है,तो उन्हे पूर्ण संतुष्टि मिलती है।कभी कभी आप ने महसुस किया होगा कि हमारा मन बहुत व्याकुल हो जाता है लेकिन हम उस का कारण नही समझ पाते । यह बैचनी क्यो है? यह व्याकुलता क्यो है?माया के कारण हम यह जान नही पाते । जो इस माया के भ्रम जाल से निकल पाता है वह ही इस रह्स्यमय और गोपनीय भेद को जान पाता है।हम ने न जाने कितनी बार जन्म लिया ,कभी स्त्री बने ,कभी पुरुष बने ।इस तरह के न जाने कितने ही विवाह किये ,पर हमे शान्ति नही मिली ।वास्तव मे हमारा मिलन शारीरिक तल तक ही सीमित था। जो काम और भौतिक कामनाओ के अतिरिक्त और कोई सृ्ष्टि पैदा नही करता है ।आत्मा के मिलन का हम ने कभी प्रयास ही नही किया अर्थात बिछुडे हुये आत्मखंड के मिलन का प्रयास ही नही किया। बिछुडे हुये आत्मखंड का मिलन जब होता है तभी सच्चे अर्थो मे वास्तविक मिलन कहा जाता है । तभी हमारी खंडित आत्मा को आन्नद प्राप्त होता है ।यही आत्मा की पूर्णावस्था है तथा मुक्ति है।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

सूर्यग्रहण


आज मौनी अमावस्या है और साथ मे महाकुम्भ का अवसर भी है,तथा सूर्य ग्रहण भी है । आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है।सच पूछा जाए तो आज के दिन इंसान् अगर अपने आप को पहचानने की कोशिश करे तो वह इसमे कायम हो सकता है ।जीवन और मृ्त्यु के चक्र मे आत्मा कब आ फंसती है,आत्मा की पूर्णा अवस्था क्या है ।ऎसे ही अनेको प्रश्न हर इंसान के दिमाग मे होते है।जिसे वह जानना चाहता है।आज के शुभ दिन द्धारा हम इसे जान सकते है यानि प्रभु की उपासना से । हमारी आत्मा अपने आप मे पूर्ण नही है, खंडित है,अपने आप मे टूटी हुई है।माया के कारण हम यह जान नही पाते है।वास्तव मे आत्मा दो खंडो मे विभाजित है।एक खंड स्त्री तत्व और दूसरा पुरुष तत्व है।प्रकृ्ति के इस वातावरण मे ये दोनो खंड अलग अलग हो गये है।हमे आत्मा के दूसरे खंड को जानने की कोशिश करनी चाहिए ।इस के लिए आज का दिन बहुत उत्तम है। सूर्यग्रहण के दौरान अपनी आंतिरक ऊर्जा का विकास करे ।समय की कमी के कारण बाकि चर्चा फिर करुंगी ।

शनिवार, 9 जनवरी 2010

हिन्दी भाषा


अँग्रेजी भाषा का प्रचलन दिनो दिनो बढता जा रहा है।वर्तमान समय में हिन्दी भाषा के प्रति देश में कम हो रहे रूझान से देश की संस्कृतिक विरासत पर नकारात्मक प्रभाव पड रहा है ।जिससे मन बहुत दुखता है। अँग्रेजी भाषा से इतने मोहित होते जा रहे है कि हिन्दी भाषा उपेक्षित होती जा रही है।आज हिन्दी -पत्रिका हो या समाचार पत्र उसे पढ़ना फैशन के विरुद्ध मानते है।हमारे देशवासी अंग्रेजी सभ्यता,साहित्य और रिवाजो पर इतना मोहित हो गये है कि आज वो पिता को डैड कहने लग गया है।डैड जिसका अर्थ है मरा हुआ व्यक्ति,जो पिता हमारे लिए पूजनीय है। आज उन्हे सम्मानजनक शब्दो मे कहने मे भी तकलीफ होती है।माता जो मम्मी बन गई है यानि मसाला लगाकर सुरक्षित रखा गया मृ्तक शरीर । शब्दो का प्रभाव तो हमारे आंतरिक सोच पर भी पड़ता है तभी तो आज माता-पिता , मम्मी डैड बनकर रह गये है यानि बच्चो को अपने माता-पिता से स्नेह लगाव सब मर कर रह गया है,एक मृ्तक शरीर की तरह !!भाषा हमारी संस्कृति का आईना है और इस प्रकार हिन्दी भाषा से दूरी हमें हमारी संस्कृति से भी दूर करेगी।भाषा के विकास एंव उत्थान के लिए हिन्दी भाषी समाज को अंग्रेजी मानसिकता छोडकर आगे आना होगा।जब तक सब मिलकर एकजुट होकर हिन्दी को सर्वोपरि समझकर नहीं बोलते तब तक हम हिन्दी भाषी एकजुट नहीं हो सकते है इसलिए आवश्यक है कि हम अपने जीवन में हिन्दी भाषा को विशेष स्थान दें।

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

प्यार की मंजिल


ये बात कालेज की दिनो की है।तब मै खूब कविताये लिखा करती थी । तब की लिखी अनेक कविताएं मेरी डायरी के पन्नो मे बंद पडी है, पर कालेज के समय हमारी एक सखी ने एक कविता ले कर स्वतंत्र दर्पण (पाक्षिक) मे छापा डाली, हमे मालूम न था ।जब पत्रिका डाक के जरिऎ हमारे घर आई तब हैरान हो गये कि ये कहां से आ गई पत्रिका ? पर जब उसे देखा तो उसमे अपनी छपी कविता को देख कर बहुत खुशी हुई । वह कविता आप भी पढिये ………...

ये प्यार की मंजिल है कठिन ,
कुछ फूल कुछ कांटे है इसमे,
जरा संभल कर चल तू,
कही चुभ न जाए कांटा,
जरा देखकर चल तू ।


ये प्यार की मंजिल है कठिन,
कुछ हरियाली कुछ पतझड है इसमे,
जरा संभल कर चल तू,
कही हाथ न आए पतझड ,
जरा देख कर चल तू ।।

ये प्यार की मंजिल है कठिन ,
पर मुश्किल तो नहीं,
फूल हो या कांटा डगर पर ,
छाई हो बहार या पतझड मौसम पर ,
जरा पहचान कर चल इस मंजिल पर ।।।

अंजना      

चित्र साभार - गूगल


शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

जाने पुनर्जन्म के बारे मे


भगवत् गीता में भी लिखा है कि जिस तरह से एक मनुष्य पुराने कपड़े उतार कर नए कपड़े पहनता है उसी तरह हमारी आत्मा भी पुराने शरीर को छोड़ कर नया शरीर धारण करती है लेकिन ये नया शरीर क्या हमे मानव का ही मिलता है या पशु का ।इस मे भी सभी के अलग अलग विचार है ।कोई कहता है कि बुरा कर्म करने वालो को अगले जन्म मे पशु की योनि मिलती है,लेकिन वास्तविकता यह है कि मनुष्य के आत्म संस्कारो,उसकी वासनाओ के परिणामो के अनुसार ही उस का अगला जन्म निर्धारित होता है,लेकिन योनि मानव की ही रहती है । पशु जैसा शरीर नही मिलता बल्कि पशु जैसा मन मिलता है यानि उसकी बुद्धि, वृत्ति,प्रवृ्त्ति, कृ्त्ति सब पशुओ जैसी हो सकती है । इस तरह उस के कर्मो और संस्कारों के परिणाम के अनुसार उसका भाग्य , प्रारब्ध और स्वभाव बदल जाता है पर योनि नही बदलती है ।मानव शरीर लेकर भी उसका जन्म गधे जैसा हो सकता है इसलिए हम इस डर को कि हम पशु-पक्षी की योनि में जन्म लेगे इसे अपने मन से निकाल दे और अशुभ कर्मो का त्याग कर मुक्ति की राह को जाएं |

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

धर्म क्या है? धर्म के कितने अंग है?

सत्य,त़प, पवित्रता ओर दया इन चारों का समन्वय ही धर्म है| धर्म का पहला अंग सत्य है| सत्य ही परमात्मा है | सत्य द्वारा नर, नारायण बनता है | धर्म का दूसरा अंग तप है | दुःख सहन कर के जो भक्ति करते है वही तप है| प्रभु आप को बहुत सम्पति देते है पर बहुत सुख का उपयोग ना करिये | जो बहुत सुख भोगता है उसके तन ओर मन दोनों बिगड़ते है| समझ कर दुःख सहन करना और भक्ति करना ही तप है| धर्म का तीसरा अंग पवित्रता है| मन को पवित्र रखिए | मरने के बाद मन साथ जाता है | मन को सम्भालिये ओर उसे भटकने ना दे | धर्म का चौथा अंग दया है | प्रभू ने आपको दिया है तो उदार होकर अन्य को भोजन कराइए | और स्वंय खाइये | प्रभु ने नहीं दिया तो दूसरों की सेवा में अपने तन को लगाइये |

बुधवार, 14 अक्टूबर 2009

श्री बालकृष्णलाल जी

प्रभु श्री बालकृष्णलाल जी को लुका छिपी का खेल बहुत प्रिय है क्यों? (वृंदावन में भी लाला अपने सखा के साथ लुका छिपी का खेल खेलते थे)क्योकि परमात्मा मानव को संसार में उस के कर्मो के अनुसार भेजते समय एक बार प्रकट होते है फिर वह छुप जाते है मानव की बारी होती है अब लाला को ढूढने की,इसलिए मानव को संसार में आकर उन्हें ढूढने का प्रयत्न करना चाहिए

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

क्यो?


न्यायलय मे गीता की शपथ ली जाती है।किसी ओर रामायण, वेद पुराणो की शपथ क्यो नही ली जाती है क्योकि जगत मे सत्य से भी बडा एक सत्य है ओर वह है प्रेम । जिसके प्रति प्रेम है उसके प्रति असत्य का होना कठिन होता है यानि जहां प्रेम है वही सत्य का दर्शन कर सकते है।प्रेम की रग को पकडना आवश्यक है तभी सत्य बुलवाया जा सकता है।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

रुद्राक्ष भाग-2

4.चारमुखी रुद्राक्ष-चारमुखी रुद्राक्ष भगवान ब्रह्माजी का स्वरुप है।इस का स्वामी ग्रह बुद्ध है। इसे धारण करने वाला वेद-शास्त्र संपन्न, ,सर्वशास्त्रज्ञ, महाज्ञानी,सबका प्रिय तथा धन- संपन्न होता है।किसी प्रकार की कमी नही रहती।इससे आत्महत्या का पातक दूर हो जाता है।ऑखो मे तेज,वाणी मे मिठास, शरीर से स्वस्थ तथा दूसरो को आकर्षित करने का गुण आ जाता है।सन्तानहीन स्त्रियो को अवश्य धारण् करन चाहिए। यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थो को देने वाला है। इसे दाहिने हाथ मे धारण करना चाहिए। यह मंद बुध्दि क्षीण स्मरण शक्ति और कमजोर वाक् शक्ति के लिए अच्छा है।इस रुद्राक्ष को गौ के दूध मे उबाले और 3-4 सप्ताह तक पीने से मानसिक रोगो मे सफलता मिलती है।
5.पंचमुखी रुद्राक्ष- इस का स्वामी ग्रह बृहस्पति है। यह पंच ब्रह्म तत्व का प्रतीक है अर्थात शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य और विष्णु की शक्तियों से सम्पन्न माना गया है।इसके धारण से शारीरिक शक्ति,मानसिक शक्ति,संपति शक्ति,भाग्यशक्ति और प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। कुछ ग्रन्थों में पंचमुखी रुद्राक्ष के स्वामी कालाग्नि रुद्र बताए गए हैं।सामान्यत: पाँच मुख वाला रुद्राक्ष ही उपलब्ध होता है। संसार में ज्यादातर लोगों के पास पाँचमुखी रुद्राक्ष ही हैं। यह युवाओं के जीवन को सही दिशा देता है। इससे धन और मान-सम्मान में वृद्धि होती है।परस्त्री गमन करने के पाप से मुक्त करता है।यह उच्च रक्तचाप को भी नियंत्रित करता है।उतराषाढ़ा (सूर्य का नक्षत्र)मे गुलाबी धागे मे बॉधकर गले मे डालने से समस्त नेत्र विकारो से निवारण होता है।रवि पुष्य योग मे ऑवले के बराबर 5 मुखी रुद्राक्ष गुलाबी धागे मे धारण करने से सभी प्रकार के ह्रदय रोगो का निदान होता है।मधुमेह, हड्डियो की कमजोरी,यकृत,गुर्दा मे मदद करता है।इसके कम से कम तीन दाने धारण करने चाहिये।
6.छह मुखी रुद्राक्ष-इस का स्वामी ग्रह शुक्र है।यह कार्तिकेय का प्रतीक है।सकारात्मक सोच,प्रखर बुद्धि,आपसी मेल सौहार्द लाता है तथा सभा-सम्मेलनों में बोलने की शक्ति प्राप्त होती है।यह शुत्र का नाश करता है।पापों से मुक्ति एवं संतान देने वाला होता होता है।गुप्तांगो,मूत्रयोनि मार्ग,ओर मुंह व गले के रोगों मे आराम पहुंचाता है।(क्रमशः)

चित्र साभार - गूगल

बुधवार, 22 जुलाई 2009

रुद्राक्ष की पहचान् और रोग निवारण


रुद्राक्ष की पहचान्

आजकल बाजार या धार्मिक स्थानो पर नकली रुद्राक्ष मिलते है।रुद्राक्ष की तरह एक फल ओर होता है जिसे भद्राक्ष कह्ते है।यह प्रायः टेढ़ा- मेढ़ा होता है।इसलिए सही तो यह होगा कि जो उसकी शुध्द्ता की 100% गारण्टी लेता हो।वही से रुद्राक्ष को खरीदे।औसतन रुद्राक्ष इण्डोनेशिया मे 70%,भारत मे 5%,और नेपाल मे 25% पाये जाते है।जिस रुद्राक्ष मे प्राकृ्तिक रुप से छेद हो वह उत्तम होता है।शुध्द रुद्राक्ष को अग्नि के समीप ले जाए तो वह बड़े वेग से (करंट लगने की तरह)उछल जाएगा। दो ताबे के सिक्को के मध्य रुद्राक्ष को रखकर दबाया जाए तो वह एक झटके के साथ दिशा बदल लेता है।रुद्राक्ष को हथेली पर रखकर दोनो हाथो से रगड़ा जाए तो "ओज्म सोहज्म" की ध्वनि सुनाई देती है। शुध्द रुद्राक्ष जल मे तैरता नही बल्कि डूब जाता है।इस तरह से आप रुद्राक्ष की पहचान कर धारण कर सकते है।

रोग निवारण रुद्राक्ष द्वारा

रुद्राक्ष कई रोगों से हमारा बचाव करते हैं।रुद्राक्ष हमारे मन को भी शांति प्रदान करने में सहायक होते हैं।रुद्राक्ष की माला पहनने से शरीर मे रक्त का संचार भी सही ढंग से होता है और हृदय भी मजबूत होता है।शहद मे घिसकर रुद्राक्ष देने से मूर्च्छा तथा मृ्गी जैसे रोगो से भी छुटकारा मिल जाता है। पेट के रोग, यकृ्त व लीवर सम्बन्धी रोगो,मानसिक दबाव (डिप्रेशन) का शिकार रहना,एकाग्रता की कमी होना,टी.वी, दमा, खॉसी, टिटेनस के रोग, रुक-रुक के ज्वर होने पर,चक्कर आने पर, प्रदक आदि स्त्रियो के रोगो मे आराम मिलता है।बुधवार को बुध की होरा मे रुद्राक्ष की माला (108) दाने की धारण करने से रक्तचाप ठीक रहता है।कौन से रुद्राक्ष से कौन सा उपचार होता है इसकी चर्चा आगे के लेख मे मै आप से करुगी।

चित्र साभार - गूगल


रविवार, 19 जुलाई 2009

रुद्राक्ष भाग-1

रुद्राक्ष

रुद्राक्ष धारण करने का प्रचलन काफी बढ़ता जा रहा हैलिंगपुराण, मत्स्यपुराण, स्कंदपुराण, शिवमहापुराण, पदमपुराण, एवम उपनिषदो मे तन्त्र मन्त्र आदि ग्रन्थो मे रुद्राक्ष के गुणो का वर्णन मिलता है।
रुद्र का अर्थ है शिव और अक्ष का अर्थ है आँख।दोनो को मिलाकर रुद्राक्ष बना।ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आँखों के जलबिंदु से हुई है।भगवान शिव के आँखों से जो जल इस धरती पर पडा उस जल से इस धरती पर रुद्राक्ष के वृ्क्ष उत्पन्न हो गये।रुद्राक्ष की उत्पत्ति के संबंध में कई तरह की पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, शिव ने सैकडों वर्ष तक साधना की। साधना पूरी होने के बाद जब उन्होंने अपनी आंखें खोलीं, तो उनसे आंसुओं की धारा निकल पडी। ये दिव्य अश्रु-बूंद जहां-जहां भी गिरे, उनसे अंकुरण फूट पडा! बाद में यही रुद्राक्ष के वृक्ष बन गए। रुद्राक्ष के संबंध में एक और कथा प्रचलित है। इसके अनुसार, एक बार दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया। हवन करते समय उन्होंने शिव का अपमान कर दिया। इस पर क्रोधित होकर शिव की पत्नी सती ने खुद को अग्निकुंड में समाहित करलिया। सती का जला शरीर देख कर शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने सती का पार्थिव शरीर अपने कंधे पर टांग लिया और पूरे ब्रह्मांड को भस्म कर देने के उद्देश्य से तांडव नृत्य करने लगे। सती का जला शरीर धीरे-धीरे पूरे ब्रह्मांड में बिखर गया। अंत में सिर्फ उनके देह का भस्म ही शिव के शरीर पर रह गया, जिसे देख कर वे फूट-फूट कर रो पडे। कहते हैं, उस समय जो आंसू उनकी आंखों से गिरे, वही पृथ्वी पर रुद्राक्ष के वृक्ष बने। ये रुद्राक्ष न केवल कई रोगों से हमारा बचाव करते हैं, बल्कि मन को शांति प्रदान करने में भी सहायकहोतेहैं। रुद्राक्ष का आकार एक बेर के आकार का होता है।लेकिन मलेशिया का रुद्राक्ष मटर के दाने के आकार का होता है, रुद्राक्ष तीन रगो मे पाया जाता है-लाल,काला,और मिश्रित्।असली रुद्राक्ष की पहचान यही है कि यह जल मे डूब जाता है,लेकिन नकली रुद्राक्ष जल मे तैरता रहता है।इस मे बनने वाली धारियो को ही मुख कहा जाता है।
रुद्राक्ष के मुख
रुद्राक्ष् के एक मुख से लेकर इक्कीस् मुख तक होते है।भिन्न भिन्न मुखो वाले रुद्राक्ष मे अलग-अलग प्रकार की शाक्ति होती है।इस के अलावा गौरी--शंकर रुद्राक्ष, गणेश रुद्राक्ष,सवार रुद्राक्ष,और त्रिजुती रुद्राक्ष भी है।जिनकी अपनी अलग महत्ता है।


1.एकमुखी रुद्राक्ष- स्वयं शिव का स्वरूप है जो सभी प्रकार के सुख, मोक्ष और उन्नति प्रदान करता है।इसके स्वामी ग्रह सूर्य है।इसलिए इसको धारण करने से सूर्य ग्रह से सम्बाधित सभी दोष नष्ट हो जाते है।यह आंख, नाक, कान और गले की बीमारियों को दूर करने में सहायक होता है।इस को धारण करने वाला ब्रह्म-हत्या जैसे महापापो से भी मुक्त हो जाता है।


2.द्विमुखी रुद्राक्ष-अर्धनारीश्वर रुप होने की वजह से एकता का प्रतीक माना जाता है।इसको धारण करने से आदशाक्ति भगवती की कृ्पा प्राप्त होती है।इसके स्वामी ग्रह चन्द्र है।जिन लोगो को बहुत गुस्सा आता है,उनको इसे धारण करना चाहिए।सभी प्रकार की कामनाओं को पूरा करने वाला तथा दांपत्य जीवन में सुख, शांति व तेज प्रदान करता है।यह धैर्य और सामाजिक प्रतिष्ठा की वृद्धि में सहायक होता है।इसे धारण करने से गौ-हत्या जैसे पाप भी दूर हो जाते है।साथ ही पाचन तंत्र संबंधी समस्याएं भी काफी हद तक दूर हो जाती हैं।


3.त्रिमुखी रुद्राक्ष- यह साक्षात तीन अग्नियो (गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि) का स्वरुप होता है।जो इसे धारण करता है,उस पर अग्नि देव प्रसन्न होते है।इस के स्वामी ग्रह मंगल है। यह स्त्री-हत्या जैसे पापो को दूर करने वाला, विधा प्रदाता,शुत्र नाश,पेट की व्याधि तथा अपघात जैसी अशुभ घटनाओ से रक्षा करता है।मधुमेह,रक्तचाप मे भी लाभकारी होता है।जो ज्वर तीन दिन पीछे आता हो इस के धारण करने से नही रहता है।यह रुद्राक्ष ऐश्वर्य प्रदान करने वाला होता है। (क्रमशः)


चित्र साभार - गूगल

सोमवार, 11 मई 2009

कालसर्प योग निवारण पाठ

जब जन्म कुंडली में सारे ग्रह राहू और केतु के बीच में होते है तब कालसर्प योग होता है .और अगर राहू और केतु के साथ किसी ग्रह की युति हो तो जातक को उस भाव अनुसार कष्टों का सामना करना पडता है इसलिए मायूस न हो कालसर्प योग से पेरशान हर जातक कालसर्प योग निवारण पाठ को पढ़ अपने मानसिक, शारीरिक ,आर्थिक,कष्टो से छुटकारा पा सकता है ।

अथः सर्प सूकत पाठ

अनन्त कालसर्प योग नाशाय विषधरं धराय च नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
कुलिक कालसर्प योग नाशाय हलाहल पानाय च नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महा देवाय च नमो नमः।
वासुकि कालसर्प योग नाशाय विषहरणाय च नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
शंखपाल कालसर्पयोग नाशाय महाकाल कालाय च नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
पदम नाम कालसर्प योग नाशाय महाकाल कूटाय च नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
पदम् नाभ कालसर्प योग नाशाय महाभय हरणाय च नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
तक्षक कालसर्प योग नाशाय महाडंस दमनाय च नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
ककोर्टक सर्पयोग नाशाय विष कष्ट हरणाय च नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
शंखनाद सर्प योग नाशाय विष पीडा निवारणाय च नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
पातक काल सर्प योग नाशय दाह दुख भंजनाय च नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
विषाक्त काल सर्प योग नाशाय विष दोष दमनाय च नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
नमस्ते शेषनाग नागाय काल सर्प योग नाशकाय नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
नमस्ते बुधन्य सुनागाय कालसर्प योग नाशकाय नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
नमस्ते नन्दसार नव नागाय कालसर्प योग नाशकाय नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
नमस्ते अश्वतरी नागाय काल सर्प योग नाशकाय नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
नमस्ते कंवल कल नागाय काल सर्प योग नाशकाय नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
नमस्ते नरेन्द्र नाग नागाय काल सर्प योग नाशकाय नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
नमस्ते वज्रदंष्ट्र नागाय काल सर्प योग नाशकाय नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
नमस्ते हेममाली नागाय काल सर्प योग नाशकाय नमः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
ब्रह्म लोकेषु ये सर्पा शेष नागादि पुरोगमा।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
ऋषि लोकेषु ये सर्पा वासुक्यादि प्रमुखादया।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
देवेन्द्र लोकेषु ये सर्पा कद्रुकादि मातृ भक्ति युता।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
असुर लोकेषु ये सर्पा तक्षकादि क्रोध संभविता।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
सत्य लोकेषु च ये सर्पा सुबुध्न्यादि शान्तिप्रिय सर्वदा।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
यम लोकेषु च ये सर्पा ककोर्टकादि अपराधिना दण्डिता।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
वरुण लोकेषु च ये सर्पा अनन्तादि च जल चरा।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
गन्धर्व लोकेषु च ये सर्पा हेममाल्यादि चसु सुगन्धिता।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
ॐ भूः लोक लोकेषु ये सर्पा कालीयादि यमी कुन्ड वासिनाः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
ॐ भुव लोक लोकेषु ये सर्पा शंख पालादि भुजंग बलाः।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।
ॐ स्वः लोक लोकेषु ये सर्पा पदम नाभादि नभ गामिना:।
नमो नीलाय नील कंठाय महादेवाय च नमो नमः।।

इति नील ग्रीवाय नमो नमः।

बुधवार, 1 अप्रैल 2009


या देवी सर्वभू‍तेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।







माँ दुर्गा आप को नमस्कार है।संपूर्ण जगत की माता आप को नमस्कार है ।तुम सर्वज्ञ, सर्वप्रकार से मंगल करने वाली एवं सर्व मंगलों की भी मंगल हो। दयासागर प्रेममय माँ दुर्गा प्रसन्न हो । तुम परब्रह्मस्वरूप, सत्य, नित्य एवं सनातनी हो।सभी की कामनाओं को पूर्ण करने वाली माँ दुर्गा मैं आपको बारंबार प्रणाम करती हूँ।




दुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी कहा गया है। तीसरा रूप चंद्रघंटा है। दुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। पाँचवा रूप स्कंद माता है। दुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है। दुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है। दुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है।




इस तरह नवरात्र के 9 दिन माँ की आराधना व पूजन,जप तन मन को शुद्ध कर संपूर्ण श्रद्धा व विश्वास से किया जाए तो कई कष्टों से बचा जा सकता हैं। साथ ही दुर्गा सप्तशती के पाठ से हर मनोकामना पूर्ण होती है ।








शुक्रवार, 20 मार्च 2009

क्या आप जानते है

क्या आप जानते है आत्मा क्या है?

आत्मा परमात्मा का एक अविनाशी अंश है। यह परमात्मा की सनातन शक्ति है किन्तु माया के कारण यह आत्मा परमात्मा से अलग नजर आता है। आत्मा परमात्मा का इसी तरह मेल है। जैसे-सूरय और उसकी किरण में। आत्मा परमात्मा का एक अविनाशी तत्व है। इसी के बल से मन इन्दिर्‌यॉ और शरीर सब अपना-अपना काम करते है। आत्मा अमर है।

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